दोस्ताना 6

साशा दिन पर दिन शैतान होती जा रही थी। उसे मैं कुछ सिखाने की कोशिश करती, तो वो भाग कर कहीं झाड़ियों में जा छुपती। गंदी तो इतनी अधिक होती, कि साफ करना भी रोज का काम हो गया था। उसे बस पूरे दिन खेलना और दौड़ना अच्छा लगता। शेरी भौंक-भौंक कर उसे अनुशासित करने... Continue Reading →

दोस्ताना-5

हमने नया फार्म खरीदा था। जब मौका लगता बड़े शौक से वहाँ जाते। नया नया जोश था। अक्सर तो हफ्ते में दो तीन बार भी चले जाते। शनिवार रविवार वहीं रहते। शेरी थी ही हमारे पास ,लेकिन वो तो फ्लॅट में ही पली बढी थी। सोचा कि एक ऐसा कुत्ता लिया जाए जो एकदम ज़बरदस्त... Continue Reading →

दोस्ताना- ४

             शेरी कई बार मुझे विश्वास होने लगता है कि सारे रिश्ते-नाते, छोटी-मोटी घटनाएँ ये किसी तयशुदा बड़ी सी दैवी योजना का हिस्सा होती हैं। जब भी मैं पीछे मुड़कर कोई घटनाक्रम देखती हूँ, तब इस बात का एहसास अधिक होता है कि अरे!! सब बातें ऐसे हुईं मानों पहले... Continue Reading →

दोस्ताना-३

अलादीन और जास्मीन एक बार हम बच्चों को ले कर खंडाला गये थे। लौटते समय लोनावला से हमने कॉकेटील की एक जोड़ी खरीदी।  उनका नाम अलादीन और जास्मीन रखा गया। पहले भी कई बार हमने पक्षी लाने के बारे में सोचा था, लेकिन किसी आजाद परिंदे को कैद करने का विचार बड़ा भयानक लगता था।... Continue Reading →

दोस्ताना -२

रॉकी सुबोध का प्राणी प्रेम कम होने का नाम नहीं ले रहा था। आखिर एक कुत्ता लाने का विचार किया गया। पप्पा के किसी परिचित की ऑलसेशियन कुतिया को पिल्ले हुए थे। पिल्लों का पिता देसी था, लेकिन बच्चे देखने में बड़े खूबसूरत थे। हम तो देखते ही फिदा हो गये। और इस तरह रॉकी... Continue Reading →

दोस्ताना

दिल का एक कोना होता है, जो सिर्फ जानवरों के लिए ही आरक्षित होता है। वो जगह दुनिया की कोई भी चीज़ या इंसान नहीं ले सकते। वह जगह सिर्फ और सिर्फ प्राणियों की ही होती है। कितने बदनसीब हैं वो लोग, जिन्होंने कभी कोई पक्षी या प्राणी नहीं पाला और ये मान कर चलते... Continue Reading →

रोने से औेर….

रोने से और........     बहुत दिनों के बाद सुबह सुबह सैर करने निकली। ठण्ड की वजह से रास्तों पर भीड़ कम थी। पार्क के सामने से गुज़र रही थी तो जोर ज़ोर से हा हा ही ही हो हो की आवाजें सुनाई दीं। कुछ देर रुक कर देखा । बहुत से अधेड़ उम्र के... Continue Reading →

आईन्स्टाईन

            आईंस्टाईन के जाने की कोई वजह ही नहीं थी। सच तो ये है कि उसके आने की वजह भी कभी मेरी समझ में नहीं आई। अच्छी भली सफेद, खुबसूरत बिल्ली, परी थी हमारी ज़िंदगी में, वो अचानक ही चल बसी। और फिर ये महाशय मानों कतार में खड़े इंतज़ार... Continue Reading →

पोरटेज

                          पोरटेज   बहुत साल पहले, भोपाल की गॅस त्रासदी के समय सबसे पहली बार यह विचार मन में आया था। आधी रात को जब किसी को कुछ भी पता नहीं था, कि क्या हुआ, अचानक भगदड़ मच गई। लोग खाँसने लगे, बंद कमरों में दम घुटने लगा। दिसंबर की जानलेवा ठंडी रात में लोग... Continue Reading →

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