ह्रदय की बात

  तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन। विकल हो कर नित्य चंचल खोजती जब नींद के पल चेतना थक–सी रही तब, मैं मलय की वात रे मन। चिर विषाद विलीन मन की, इस व्यथा के तिमिर वन की मैं उषा–सी ज्योति-रेखा, कुसुम विकसित प्रात रे मन। जहाँ मरू–ज्वाला धधकती, चातकी कन को तरसती, उन्हीं... Continue Reading →

हंगामा है क्यों बरपा

  हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है   ना-तजरबा-कारी से वाइज़ की ये हैं बातें इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है   (ना-तजरबा-कारी= अनुभव हीनता, वाइज= धर्म गुरू)   उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है... Continue Reading →

उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं 

उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताते भी नहीं (उज्र = संकोच, झिझक, बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात = मुलाकात बंद करने की वजह) मुंतज़िर हैं दम-ए-रुख़्सत कि ये मर जाए तो जाएँ फिर ये एहसान कि हम छोड़ के जाते भी नहीं (मुन्तजिर = इंतज़ार में , दम-ए-रुखसत = अंतिम समय) सर उठाओ तो... Continue Reading →

कौन कहता है मुहब्बत की ज़ुबां होती है

  कौन कहता है मुहब्बत की ज़ुबां होती है कौन कहता है मुहब्बत की ज़ुबाँ होती है ये हक़ीक़त तो निगाहों से बयाँ होती है वो न आये तो सताती है ख़लिश सी दिल को वो जो आये तो ख़लिश और जवाँ होती है (ख़लिश = चुभन, वेदना) रूह को शाद करे, दिल को जो पुरनूर करे हर... Continue Reading →

हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह

आज पेश कर रही हूँ फिल्म दस्तक का गीत हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह (मता= वस्तु , कूचा-ओ- बाज़ार= गली और बाज़ार)    वो तो कहीं है और मगर दिल के आस-पास फिरती है कोई शय निगह-ए-यार की तरह... Continue Reading →

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