दोस्ती

एक किताब किसी लायब्रेरी में देखी थी। मैं बच्चों के लिए खरीदना चाहती थी पर मिली नहीं। तो हमने अपनी खुद ही बना ली। कहानी उसी अंग्रेजी किताब से प्रेरित है। एक कहानी , कुछ नीली, कुछ पीली और कुछ हरी।

लोटा

‘दिग्विजय सिंग डेव्हनपोर्ट’ यह उनका नाम जितना आकर्षक और रौबदार था, उतने ही सीधे-सादे वो खुद दिखते थे। साँवला रंग, मध्यम कद-काठी, छोटी सी मूँछें, सुनहरी प्रेम का चश्मा, कुछ भी ऐसा नहीं था, जिसे विशेष कहा जा सके। हर रविवार सपरिवार चर्च जाते। रोज सुबह-शाम खाना खाने से पहले बिना चूके प्रार्थना करते। दिग्विजय... Continue Reading →

कोयला भया ना राख

पत्र का आखरी भाग अवनि ने फिर से पढ़ा। “शादी में तुम सभी आ पाते तो अच्छा होता। प्रिया मौसी तो  तुम्हारे अकेले आने से बहुत दुखी होगी, उसके घर की यह पहली ही शादी है। उस पर संजू ने लगभग चालीस लड़कियाँ देख कर ये लड़की पसंद की है। लेकिन क्या करें? अब परीक्षा... Continue Reading →

चलो,कोई तो है !

चलो,कोई तो है !   शास्त्रीजी सारे घर के दो चक्कर लगा चुके थे। सुमन किचन में काम कर रही थी। आदित्य दाढ़ी बना रहा था। बच्चे स्कूल के लिए तैयार हो रहे थे। शास्त्रीजी ने सोचा कुछ काम किया जाए। लेकिन क्या? जब तक पत्नी जीवित थी, तब तक तो उन्हें यही लगता था,... Continue Reading →

तोहफा

तोहफा   ट्रेन में मिली थी मुझे वो। दुबली-पतली, छोटी बच्ची जैसी, लम्बी चोटी वाली सरदारनी। नाम था बीबा। उसका नाम बीबा है ,ये मुझे ही नहीं, टिकिट चेकर, आसपास से निकलने वाले यात्री, जिस टॅक्सी से वो लोग स्टेशन आए होंगे, उसका ड्रायवर, यहाँ तक कि, उनका सामान उठाने वाले कुली को भी पता... Continue Reading →

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