मैनें देखा ही नहीं

मेरी खिड़की से बाहर जहाँ तक नजर जाती है दिखती हैं बस इमारतें खिड़कियाँ, और दरवाजे पानी की टंकियाँ और एंटिने इस तरह स्पर्धा करते से, लगता हैं मानों किसी  भीड़ भरे प्लेटफार्म पर गाड़ी पकड़ने एक दूसरे से धक्कामुक्की करते लोग हों। जब भी बाहर देखती हूँ तो  थोड़ा सा सिकुड़ा सा आसमान देख... Continue Reading →

भूलभुलैया

जैसे ज़ीना चढ़ते चढ़ते बीच की सीढ़ी हो जाए गुम, जैसे कुछ भूला ना हो,पर याद आए सब थोड़ा कम। रोज का रस्ता हो कर भी जब कुछ ना लगे पहचाना सा, अपना ही चेहरा दर्पण में लगे बड़ा अनजाना सा। चेहरा जो आंखो के आगे, उस चेहरे को नाम ना हो, और जुबां पर... Continue Reading →

जेरूसलम डायरी -4

ऐ खुदा माफ कर उन्हें  वो नहीं जानते वो क्या कर रहे हैं। सलीब पर कांटों का ताज पहने  राजाओं के राजा ने आंखे उठा कर याचना की थी। कितना दीन होना पड़ता है बड़ा होने के लिए कितना झुकना पड़ता है ऊपर उठने के लिए। सजा देने का तो दूर माफ करने का अधिकार भी... Continue Reading →

जेरूसलम डायरी-3

ये खंडहर किसी ज़माने में आलीशान महल था, जो फलां धर्म के अमुक राजा ने फलां सदी में अपनी फलां रानी के लिए बनवाया था। और फलां आक्रमणकारी ने अमुक सदी में फलाना वजह से इस बरबाद किया था। गाईड अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा था समझाने की, लेकिन उसकी किस्सागोई में वो... Continue Reading →

जेरूसलम डायरी 2

जेरूसलम डायरी २ यहाँ जेरूसलम की पश्चिमी दीवार के सहारे दुख से विलाप करते लोगों को देख कर ये खयाल आता है कि हर देश के हर शहर में कोई एक जगह ऐसी ज़रूर होनी चाहिए जहाँ खुलेआम,खुल कर रो सकें लोग। जब बसाए जाते हैं शहर,गाँव,कस्बे तो विचार किया जाता है बगीचों, सिनेमा, नाट्यघरों... Continue Reading →

जेरूसलम डायरी-1

जेरूसलम की संकरी गली में सामानों और लोगों से ठसाठस भरे बाज़ार के बीच एक मोड़ पर रुक कर उसने उँगली दिखाई। यहीं, इसी जगह पर गिरा था मसीहा। बोझ जब हद से अधिक बढ़ गया, ज़ख्म रिसने लगे, पैर लडखडाने लगे। यहीं, इसी जगह गिरा था मसीहा। दुकानदारों और खरीददारों की भीड़ में रौशनियों... Continue Reading →

क्या क्या मैं कहाँ रख लूँ..

सीने की अतरदानी में जंगल की महक रख लूँ गीली सी हवा रख लूँ अलसाई किरन रख लूँ झरनों के गीतों को झुमकों की तरह पहनूं कानों में झीलों की अल्हड़ सी खनक रख लूँ पलकों में छुपा लूं मैं इस धुंध की तस्वीरें कोहरे की जुल्फों को सुलझाती किरन रख लूँ। फिर लौट के... Continue Reading →

रे मन, कितने मिडिल क्लास हो तुम!

रे मन,कितने मिडिल क्लास हो तुम! क्या कभी खुले दिल से बेधड़क, बेहिचक खुल कर, कोई भावना खर्च कर पाए हो तुम? प्यार हो,नफरत हो या चाहे क्रोध हो, हर बार पड़ जाते हो जमा-खर्च के चक्कर में। किसे बुरा लगेगा,किसे अच्छा, कौन रिश्ता बनेगा,क्या टूटेगा और किस में पड़ेंगी दरारें.. यहां तक कि तुमसे... Continue Reading →

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