स्वतंत्र अभिव्यक्ति

छोटी बड़ी खुशियाँ, आते जाते गम
परेशानियाँ, राहतें, चाहतें, सपने
दोस्त, दुश्मन, पराए, अपने
सब हैं मेरे साथ हमेशा।
मेरी यादों में रचे बसे।
ये यादें हीं तो मैं हूँ
मेरा ही हिस्सा हैं ये यादें।
वो कि जब सहेली,चाय
और बातों के साथ
ना जाने कितने पकौड़े
ना जाने कहाँ गये थे।
वो कि जब खुद पर खुश हो कर
खुद के लिए ही रजनीगंधा के फूल
और चॉकलेट खरीदे थे।
वो कि जब बहुत दिन बाद
विदेश से लौटे दोस्तों के साथ
केक और कॉफी पर रात देर
तक गप्पें चली थी।
वो कि जब पोता होने पर
बहन नें अपनी सारी खुशियाँ
चाशनी में  उडेल कर
गरमा गरम जलेबियाँ खिलाई थी।
वो कि जब कान्हां में शेर की
राह देखते देखते मुट्ठी भर काजू
खा कर खत्म कर दिए थे।
वो कि जब मुझे रसोई से
छुट्टी देने के लिए
बच्चों ने पिज़्ज़ा मँगवाया था।
पति ने पहली बार खाना बनाया था।
 मैने जीवन खुल कर जिया है।
हर रंग को सहजता से
बेझिझक स्वीकार किया है।
ये जो आपको मेरे शरीर पर दिखता है
ये तो मेरी यादे हैं…….
सहजता है,
आज़ादी है, अभिव्यक्ति है
जो मेरे रोम रोम से फूट रही है।
उसे बडी बेदर्दी से मुटापे जैसा
भद्दा नाम मत दीजिए साहब।

3 thoughts on “स्वतंत्र अभिव्यक्ति

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  1. Baate kitni sahjta se kah di aapne.. umr aksar dusre dekhne walon ke liye mahtv rakhte hon.. par hum to barson se waise ke waise hi hote hain.. kitna koi hisaab rakhe es dhalti shaam ka.. maja to apna kuch alag hi hai es suhaani shaam ka bhi.. pure din ka ek hissa hi to hai.. koi din kahe, koi shaam to koi raat hone ko hai aisa bhi kah sakta hai.. par fark kyun padna chahiye es din ko apni suhani shaam se.. vo bhi to uska hi hai.. kahan fark padtha hai.. dil aur man sab waisa hi to hai..

    Aksar hisaab karne baitho apni unr ka to lagta hai kahan se kahan aa gaye.. aapki panktiyan bahut kuch yaad dila gayi.. so rok nahi paya khud ko.. umeed shyed samjhe aap..

    Manish sinha..

    Like

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