दोस्ताना 6

साशा दिन पर दिन शैतान होती जा रही थी। उसे मैं कुछ सिखाने की कोशिश करती, तो वो भाग कर कहीं झाड़ियों में जा छुपती। गंदी तो इतनी अधिक होती, कि साफ करना भी रोज का काम हो गया था। उसे बस पूरे दिन खेलना और दौड़ना अच्छा लगता।

शेरी भौंक-भौंक कर उसे अनुशासित करने का प्रयत्न करती, फिर हार कर छोड़ देती।

एक शनिवार हम फार्म पर गये। हमेशा की तरह पहुँचते ही पहले मैने उसकी सफाई की। साशा ने बच्चों के साथ बेतहाशा मस्ती की।

रविवार की सुबह अचानक साशा आ कर मेरी गोद में घुस गई। उसके लिए छुपने की वो हमेशा की जगह थी। लेकिन उसके बाद मुझे उसका बर्ताव कुछ अजीब सा लगा। मेरी गोद मे सर रख कर मुझे वो कुछ अजीब नज़रों से देख रही है, ऐसा मुझे लगा।

बड़ी देर तक वह अपने स्वभाव के विपरीत बिल्कुल शांती से बैठी रही। उसकी नज़र में एक अजीब सी करुणा थी। उसका एकटक मुझे देखना भी बेहद अस्वाभाविक और असाधारण सा था।

ऐसी नज़र मैनें ज़िंदगी में कभी अनुभव नहीं की थी। न जाने क्यों मेरे मन में विचार आया कि उसकी नज़रों में मानों मृत्यु की छाया है।

फिर बच्चे आ गये तो उसने उनके पीछे भागने की कोशिश की, लेकिन हमेशा की तरह जोश नहीं था। रविवार दोपहर को उसकी आँख और नाक से थोड़ा पानी आ रहा था, मानों सर्दी हो गई हो। शाम को जब हम फार्म से वापस घर लौट रहे थे, तब वो कुछ सुस्त थी, लेकिन साधारण तौर पर ठीक ही थी।

सोमवार को करीब बारह बजे हमारे केयर टेकर अण्णा का फोन आया कि सुबह-सुबह अचानक साशा के मूँह से झाग आने लगा। और उसके कुछ करने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई।

उसका ऐसा खयाल था कि जिस तरह उसके मूँह से झाग आ रहा था, उससे तो ऐसा लगता है कि उसकी मौत साँप के काटने से हुई है।

बच्चों ने बहुत शोर मचाया। उनका कहना था कि हमें दिख रहा था कि वो बीमार है, पर हमने उसे गंभीरता से नहीं लिया।

लेकिन वह सचमुच इतनी बीमार तो निश्चित ही नहीं लग रही थी, कि जिससे उसकी मौत हो जाए।

अण्णा इस बात पर अड़ा था कि साशा की अवस्था बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी साँप काटने पर होती है।

डॉक्टर से बात करने पर और इंटरनेट पर बहुत खोज करने पर भी मैं इस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी, कि साशा की मृत्यू का कारण क्या था। कोई बीमारी या सर्प दंश ?

सबक इस घटना से यह मिला कि इसके बाद मैने किसी भी प्राणी की बीमारी को बहुत गंभीरता से लेना शुरू कर दिया।

और उसके बाद मैनें मुंगुस की खोज पूरे जोर-शोर से शुरू कर दी।

एक दिन गाँव में रहने वाला एक देवर आया। वह कहने लगा कि उसमें क्या बड़ी बात है। अपने खेतों में हमेशा ही मुंगुस दिखते रहते हैं। मैं एक बच्चा पकड़ दूँगा।

सच में कुछ ही दिन बाद उसने खबर दी कि एक मुंगुस का बच्चा उसने पकड़ लिया है। दरअसल वह बच्चा नहीं बच्ची है, तो उसका नाम उसने रानी रखा है।

रानी मुंगुस खेत में ही काम करने वाले, और वहीं रहने वाले एक परिवार के पास पिंजरे में रखा है। तो हम जब चाहें उसे ले आएँ।

मुंगुसों की अदभुत कहनियाँ सुनते-सुनते ही तो हम बड़े हुए हैं। रिकि-टिकी-टावी या पंचतंत्र वाले होशियार, ईमानदार और बहादुर मुंगुस वास्तव में कैसे होते हैं, और पालतू बनाए भी जा सकते हैं या नहीं, ये जानने को मैं बेहद उत्सुक थी।

हम जब उसे लेने गाँव पहुँचे, तब तक वो साधारण तीन महीने की हो चुकी थी।         वो लोग उसे दूध चावल खिलाते थे। रात भर पिंजरे में बंद रहती और सुबह होते ही उसे खुला छोड़ दिया जाता। फिर पूरा दिन उनके सात आठ साल के लड़के के साथ खेलती रहती। खेतों में उसके पीछे पीछे दौड़ती।

जैसे ही उसकी प्लेट में दूध चावल डाला जाता, ना जाने कैसे उसे पता चल जाता । कहीं भी हो दौड़ी-दौड़ी आती।

जब वह बच्चा स्कूल जाता, तो आधा रास्ता उसके पीछे दौड़ लगाती और फिर वापस आ जाती।

जब हम उसे लेने पहुँचे तो वो बच्चा स्कूल गया था। उसे शुरू से ही बताया गया था कि वह मुंगुस हमारे लिए ही पकड़ा गया है। लेकिन जब वह स्कूल से लौटा और उसने हमें देखा, तो रोना शुरू कर दिया।

उसके माँ बाप उसे समझा रहे थे। लेकिन वो बहुत नाराज था। रोते-रोते मुझसे कहने लगा कि अपना मुंगुस खुद पकड़ो ना। मेरा क्यों चाहिए तुम्हें?

हमें भी उसकी बात में तथ्य नज़र आया।

तो उसका मुंगुस वहीं उसके पास ही छोड़ कर हम वापस आ गये।

लौट कर मैनें अपने सर्पमित्र को ये वाक़या बताया। वो हँसने लगे।

बोले “अरे मुँगुस पालना आसान नहीं। और वह हमेशा एक जगह टिक कर भी नहीं रहते। लेकिन यदि तुम साँप के डर से मुंगुस पालने का विचार कर रही हो, तो इसके लिए बिल्ली पालना ज्यादा समझदारी की बात है।”

एक तो बिल्लियाँ खुद भी इंसान के साथ रहना चाहती हैं, दूसरे बिल्ली के रिफ्लेक्सेस असाधारण रूप से तेज होते हैं। साँप को मुंगुस की अपेक्षा बिल्ली ही सहजता से मारती हैं।”

तो इस तरह हमारे परिवार में आगमन हुआ बँटी, बबली, स्नो, छोटू और उनकी अगली कई पीढ़ियों का।

सबसे पहले हम दो सुनहरे बिल्ली के बच्चे लाए। उनका नाम पहले ही बंटी और बबली रखा हुआ था। फिर आई काली सफेद छोटू और उसके बाद एक मोटा और खूँखार बिल्ला स्नो।

ये सभी बिल्लियाँ जब तक छोटी थी, तब तक हम उन्हें खिलाया पिलाया करते। लेकिन जब हमने उन्हें खाना देना बंद कर दिया तो वो खुद अपना शिकार करने लगीं।

यकीन जानिए , कुछ ही दिनों में चूहे और छिपकलियाँ  भीबेहद कम हो गये।

और रही बात साँपों की, तो उनका भी हमारी बिल्लियों ने लगभग सफाया कर दिया। छोटे- छोटे साँप तो वो मार कर खा ही गईं। कभी कभार अब भी एकाध साँप निकल आता है , लेकिन अब उनकी संख्या इतनी कम है कि साल दो साल में कभी कभार दिखाई देते हैं।

शुरू शुरू में हमारे कुत्ते बिल्लियों को पकड़ने की कोशिश करते थे।

एक बार हम सब पेड़ के नीचे बैठ कर मजे में भुट्टे खा रहे थे। चारों कुत्ते शेरी, रॉकेट, टायगर और हीरो वहीं आस पास घूम रहे थे। अचानक हीरो भागा।

फिर सारे कुत्ते भागे। और बेहद जोर से भौंकने और गुर्राने की आवाजें आने लगी। हम सब देखने के लिए उनके पीछे दौड़े कि क्या हुआ।

सामने का दृश्य बेहद भयानक था। छोटू बिल्ली को एक तरफ से हीरो और दूसरी तरफ से टायगर ने पकड़ा हुआ था। वह चीख रही थी, सारे कुत्ते भौंक रहे थे। हम भी उनके साथ जोर-जोर से चीखने लगे। कुत्ते इतने जोश में थे और उनके खुले जबडों और दातों की वजह से भयानक लग रहे थे।

हमारा चिल्लाना सुन कर धनंजय दौड़ा आया। उसने आते ही पहले लपक कर हीरो को एक लात मारी। उसके मूँह से बिल्ली छूटी। वो मेरे नाम से चिल्ला रहा था कि बाकी कुत्तों को पकड़। लेकिन उस सारे हंगामें में मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी।

सारे कुत्ते टायगर के मूँह में फँसी बिल्ली को पकड़ने के लिए झपट रहे थे। यदि आपने हमारे टायगर को देखा होता तो आपको अंदाज आता कि वह कितना बड़ा था। मेरे तो हाथ पैर थर थर काँपने लगे।

कुछ ही क्षणों बाद धनंजय जमीन पड़ा था, उसने खींच कर टायगर का जबड़ा खोला। बाकी तीन कुत्ते उस पर झपट रहे थे। वो उनको पकड़ कह कर मेरे नाम से चिल्ला रहा था। इतना ज्यादा शोरोगुल मचा था कि क्या कहूँ।

बाप रे ! रोंगटे खड़े करने वाला दृश्य था। अपने ही कुत्ते थे लेकिन मेरी तो क्या,  आस-पास खड़े किसी की भी हिम्मत नहीं पड़ी उनके पास जाने की। भौंकते, दाँत दिखाते कुत्तों का रुद्रावतार देख कर सबकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई थी।

जैसे ही धनंजय ने टायगर का जबड़ा खोला, छोटू   उसकी पकड़ से छूटी और बेहद  तेजी से भागी और गायब हो गई।

उसे कितना लगा है ये देखने के लिए भी कोई उसे ढूँढ नहीं पाया।

वह सारा हादसा इतना भयानक था कि हमारे एक मित्र की 14-15 साल की बेटी , जो उस दिन वहाँ थी, उसने कसम खाई कि अब वह कभी वहाँ नहीं आएगी, और ना ही कभी कुत्ता पालेगी।

धनंजय को नसीब से गिरने के कारण कुछ खरोंचों के अलावा कोई चोट नहीं आई थी, ना ही किसी कुत्ते के दाँत लगे थे।

करीब महीने भर बाद फिर छोटू वापस दिखी। अच्छी भली थी। उसे यदि कोई चोट लगी भी होगी तो अब तक वह ठीक हो चुकी थी।

जैसे ही उसने धनंजय को देखा तो वह उसके पैरों पर लोटने लगी। जहाँ वह बैठता वहीं बिल्कुल उससे सट कर बैठती।

उसके बाद जब तक वह रही, तब तक, जितनी बार उसे धनंजय दिखता उतनी बार वह उसके पास आ कर बेहद कृत्तज्ञता दिखाती।

स्नो एक बेहद बड़ा और खूबसूरत बिल्ला था। लेकिन बड़ा खूँखार था। बिल्कुल छोटा था तब किसी ने उसे पाला था, लेकिन डर कर हमें दे डाला।

बड़ा प्यारा दिखता था। लेकिन जहाँ किसी ने हाथ लगाने की कोशिश की तो ऐसा खींच के पँजा दे मारता कि उसके नाखूनों से अगले का खून ही निकल आता।

अच्छे अच्छे बिल्ली प्रेमी जो किसी भी बिल्ली को बेधड़क हाथ लगा लेते हैं या उठा कर प्यार करते हैं वे भी उसके नाखूनों से नहीं बच पाए।

और तो और उसने धनंजय को भी नहीं छोड़ा।

उसकी अपनी अलग ही शान थी।

वो आस पास होता तब भी अपने पास किसी को फटकने भी नहीं देता। कभी कभी अचानक ही कई कई दिनों के लिए गायब हो जाता।

बिल्लियों से इज्जत से पेश आना चाहिए ये सबक हमारे कुत्तों को आखिर स्नो ने ही सिखाया।

कोई कुत्ता पास आए तो वो अपने आप को गुब्बारे की तरह फुला लेता। उसकी पीठ के सारे बाल खड़े हो जाते और भयानक भयानक आवाजें निकालता।

उस पर भी यदि कुत्ते को समझ ना आए तो ऐसा खींच कर उसकी नाक पर पँजा मारता कि कुते की नाक लहूलुहान हो जाती।

कुछ ही दिनों में कुत्तों ने बिल्लियों के पीछे दौड़ना तो दूर उनकी तरफ ध्यान देना ही बंद कर दिया।

अब तो बँटी,बबली,स्नो और छोटू सभी ना जाने कहाँ चले गये। लेकिन हमारे फार्म पर अब भी उनके पाँच छ: बाल बच्चे आज भी हैं।

पर आज भी हर एक काली सफेद बिल्ली का नाम छोटू है। अब भी सुनहरी हर बिल्ली को बँटी और हल्की भूरी सभी बिल्लियों को हम हमेशा स्नो कह कर ही पुकारते हैं।

अगली बार रॉट वायलर, टायगर और रॉकेट

 

 

 

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