दोस्ताना-5

हमने नया फार्म खरीदा था। जब मौका लगता बड़े शौक से वहाँ जाते। नया नया जोश था। अक्सर तो हफ्ते में दो तीन बार भी चले जाते। शनिवार रविवार वहीं रहते।

शेरी थी ही हमारे पास ,लेकिन वो तो फ्लॅट में ही पली बढी थी। सोचा कि एक ऐसा कुत्ता लिया जाए जो एकदम ज़बरदस्त गार्ड डॉग हो, और वहीं रहे। बड़ा रिसर्च करने के बाद तय हुआ कि डोबरमॅन जाति का कुत्ता लाया जाए।

और इस तरह साशा हमारे घर आ गई।

बड़ी खोज के बाद एक ब्रीडर के यहाँ से ,हमारे पशु चिकित्सक मित्र को साथ ले जा कर बहुत से  पिल्लों में से छाँट कर साशा को लिया गया।

पहले उसे घर ले कर आए। वो इतनी अधिक शैतान थी कि कुछ घंटों में उसने तूफान मचा दिया। उसे वैसे भी फार्म पर ही रखना था।

उसे फार्म पर ले जाया गया। कुछ दिन हम भी उसके साथ वहीं रहे। वह पूरा दिन मस्ती करती रहती। हर चीज को नाक लगा कर, चाट कर देखती।

नील को उसने अपना मालिक मान लिया था। पूरा दिन उसके पीछे दौड़ती रहती। वो भी बेहद खुश था। शेरी ने साशा की तरफ ध्यान देने से भी इंकार कर दिया। वो पास आती तो शेरी थोड़ा सा गुर्रा कर उसे चेतावनी देती। साशा फिर भी उसके पीछे पड़ी रहती।

इसी दौरान एक घटना और हुई।

आम के पेड़ पर एक दिन अचानक एक बेहद खूबसूरत सा साँप दिखा। पीले मटमैले रंग का। उसकी पीठ पर भूरे काले शक्करपारे जैसा डिजाइन था। दूर से तो बेहद खूबसूरत लग रहा था। मैने तय किया कि वो अजगर है। और चूंकि अजगर विषहीन होते हैं इसलिए सभी काम करने वालों को हिदायत दी कि उसे बिल्कुल ना छेड़ा जाए।

लेकिन साँप देखते ही मारे डर के सबका चैन हराम हो गया। मैं कुछ देर के लिए बाहर गई और उन्होंने पहली फुर्सत में उसे मार डाला। मरा हुआ साँप देख कर मुझे बेहद दुख हुआ। बच्चे उस मृत साँप से ही कुछ देर खेलते रहे।

लेकिन हमारे कामगारों को उस मरे हुए साँप से भी डर लग रहा था। हर एक के पास ढेरों किस्से कहानियाँ थीं कि साँप किस तरह बदला लेते हैं वगैरह वगैरह। फिर उन्होनें बाकायदा उसकी चिता बना कर जला डाला।

कुछ दिनों बाद मैं एक सर्प विशेषज्ञ मित्र को ये किस्सा बता रही थी, तो वो कहने लगे कि मेरे वर्णन के हिसाब से तो वो रसल्स वायपर भी हो सकता था। उन्होंने उसके खतरे से मुझे आगाह करवाया कि यदि वह किसी को काट लेता तो कितना खतरनाक होता। फिर उन्होंने मुझे सख्त ताकीद दी कि अगली बार मैं अपना दिमाग चलाने की बजाय, तुरंत किसी सर्प मित्र को बुलाऊँ। पास ही रहने वाले एक सर्प मित्र का उन्होंने फोन नम्बर भी दिया।

इसी दौरान एक और रोचक हादसा हुआ।

एक युवा दर्जी ने प्रेम विवाह किया। अपनी नई नवेली पत्नी को वो कोई जबरदस्त तोहफा देना चाहता था। लड़की को कुत्ता पालने का बड़ा अरमान था। तो इन साहब ने आगा देखा ना पीछा। तीस पैंतीस हजार रुपये का एक सेंट बर्नार्ड जाति के कुत्ते का छोटा सा,प्यारा सा पिल्ला खरीद कर उसे तोहफे में दिया।

लेकिन उन्हें इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि सेंट बर्नार्ड दिन दूने और रात चौगुने बढ़ते हैं।

उनके दस बाय दस के घर में ही आगे को उसकी टेलरिंग की दूकान भी थी।

उन्हें वह कुत्ता बेचने वाले व्यक्ति ने भी गैर जिम्मेदाराना तरीके से ,उनके बारे में कोई पूछताछ किए बिना, और उस जाति के बारे में उन्हें कोई जानकारी दिए बिना, पिल्ला बेच दिया। विदेशों में तो ऐसे ब्रीडर पर कानूनी कार्यवाही होती है।

कुछ ही महीनों में जब उनका नन्हा मुन्ना सिम्बा 50 किला का हो गया, तो वो उससे डरने भी लगे। महाराजा की तरह घर के तीन चीथाई हिस्से में सिम्बा रहता। वो दोनों युवा मियाँ बीबी उसके आस पास दुबक कर रहते। उसे बाहर घुमाने ले जाने की भी हिम्मत उनमें नहीं थी। डरते तो वो उससे थे ही। लड़की तो उसे हिला भी नहीं पाती। लड़का उसे घुमाने ले जाता , मगर जाना कहाँ है ये सिम्बा ही तय करता। उसके एक जोरदार झटके से भी बेचारा उसका मालिक गिर पड़ता।

जब उसका बढ़ना रुकने का नाम ही ना ले तब वे घबराए और उन्होंने हमारे पशु चिकित्सक मित्र से संपर्क किया कि वे उस कुत्ते को बेचना चाहते हैं। उसके खाने पीने और वॅक्सीन आदि पर वो पहले ही हैसियत से अधिक खर्च कर चुके थे। तो वो चाहते थे कि जितना वसूल हो जाए, हो जाए, लेकिन कुत्ते से जान छूटे।

हमारा शेरी को गोद लेने का प्रयोग यशस्वी होने की वजह से उन्होंने सबसे पहले हमसे पूछा। जब मैं सिम्बा को देखने गई तो उस छोटे से घर में वो इतना बड़ा लग रहा था कि पूरा घर सिर्फ एक कुत्ते से भरा हुआ लग रहा था।

पूरे समय घर में बंधे रहने की वजह से उसे जरा भी व्यायाम नहीं था, और इस कारण उसके पीछे के पैर बाहर की ओर थोड़े गोल से मुड़ गये थे।

मैनें उस कुत्ते का आकार देख कर कहा कि मुझे घर में बात करनी होगी और यदि मेरे पति मान जाएँ तो उसे ले जाने के लिए एक बड़ी गाड़ी लानी होगी। उसके बाद भी मैं उसे एक महीना ट्रायल के तौर पर रखूँगी। और यदि वह ठीक रहा, तो फिर उसके पैसे दूँगी।

मेरे पति तो सदैव ही तैयार थे। टेलर महोदय मुझे सुबह-दोपहर फोन करने लगे कि जल्दी ले जाओ। मैने कहा कि मैं उसको रखने की व्यवस्था कर के अगले हफ्ते ले जाऊँगी। लेकिन वो तो इतने परेशान थे कि अगले ही दिन खुद ही सिम्बा को रिक्शा में बैठा कर चालीस किलोमीटर दूर हमारे फार्म पर ले आए। बड़ा मज़ेदार नज़ारा था।

रिक्शा के एक दरवाजे से उसका सिर बाहर आ रहा था और दुसरे से पूँछ। सीट पर उसका मालिक पैर ऊपर किए बैठा था।

सिम्बा आ तो गया ,लेकिन उसके पास जाने को भी हमारे केयरटकर तैयार नहीं थे। एक बार उसे बाँध दिया तो बेचारे के पास जा कर उसकी जंजीर खोलने की हिम्मत भी हम में से किसी को नहीं हो रही थी।

दो ही लोग थे जो उसके भौंकने और उसके आकार से ज़रा भी विचलित नहीं थे। एक तो था धनंजय और दूसरी हमारी तीन महीने की साशा।

धनंजय ने बेहिचक जा कर जब उसे खाना खिलाया और जंजीर खोल कर थोड़ी देर घुमाया तो उसे भी शायद धनंजय के प्रति आदर लगने लगा। लेकिन मुसीबत ये हो गई कि उसके कारण धनंजय को दिन में दो बार इतनी दूर फार्म पर जाना पड़ता। एक आध बार तो वह रात वहीं रुक कर सुबह जल्दी उसे खिला कर और घुमा कर फिर वापस आया। शेरी को हम घर पर ही रखते। हमने सोचा कि एक बार सिम्बा थोड़ा सेटल हो जाए तब उनकी पहचान करवाई जाए।

दिन भर कोई उसके पास भी नहीं जाता सिवाय साशा के। न जाने क्यों सिम्बा  उससे डरता था। वो जाती और उसके लिए प्लेट में रखा खाना खा जाती। फिर उसे खाना देने भी कोई उसके पास नहीं जाता। सब धनंजय का इंतजार करते रहते।

इसी तरह कुछ दिन गुजरे। फिर धीरे-धीरे ऐसा लगने लगा कि उसकी सबसे दोस्ती होने लगी है। खुला होता तो वो खुद ही पास आ बैठता।

एक दिन शाम को धनंजय उसे खाना देने गया। वो शांती से देखता बैठा था। और फिर ना जाने क्या हुआ उसने अचानक लपक कर धनंजय का पैर पकड़ लिया। सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि मेरी कुछ समझ में भी नहीं आया। जब धनंजय ने उसे डाँटना शुरू किया, तब तक तो उसकी पैंट तार तार हो चुकी थी। हालंकि उसे खास चोट नहीं आई थी लेकिन थोड़े दाँत तो लगे ही थे।

सिम्बा को भी शायद अपनी गलती का एहसास हुआ। वो एकदम अपराधी सा चेहरा बना कर उसे चाटने लगा। रात को ही हमारे पशु डॉक्टर मित्र को फोन किया। उन्होंने ही उसे रेबीज का वॅक्सीन दिया था, इसलिए धनंजय को इंजेक्शन लगवाने की जरूरत नहीं पड़ी।  उसके बाद तो हमारे फार्म पर काम करने वाले सभी इस कदर डर गये कि वे उसके वहाँ रहने के ही खिलाफ हो गये।

टेलर को फोन किया तो वो बेचारा उसे मुफ्त में देने को तैयार हो गया। वो तो इस कदर सिम्बा से पीछा छुड़ाना चाहता था कि यदि हम कहते तो वो खुद ही पैसे भी दे देता उसे रखने के लिए।

मेरे सामने प्रश्न था कि सिम्बा ने ऐसा क्यों किया ? हफ्ते भर में सिम्बा का बर्ताव इतना अच्छा था कि मैं और बच्चे भी उसके पास जा कर उसे हाथ लगा लेते थे। उस दिन तो वह बिल्कुल आराम से बैठा हुआ था । उसने गुर्रा कर कोई चेतावनी भी नहीं दी थी, जैसी कि आमतौर पर कुत्ते यदि कोई बात पसंद ना आए तो देते हैं।

इतना काटने के बाद भी धनंजय उससे नाराज या डरा हुआ नहीं था। उसे खाने घुमाने का काम तो अब उसके सिवा दूसरा कोई करना संभव ही नहीं था। बस अब वह कुछ सावधान हो गया था,

उसका कहना था कि सिम्बा बेहद बुद्धिमान है। उसे इस तरह अकेले अनजान जगह पर,अनजान लोगों के बीच नहीं रहना था। इस लिए उसने सोच समझ कर उसे थोड़ा सा काटा ताकि उसे वापस उसके घर भेज दिया जाए।

शेरी से उसकी परिस्थिती अलग थी। वो तो खुद को उस घर का मालिक समझता था जिसमें वे बेचारे युवा पति-पत्नि उसकी सेवा करते थे।

आखिर कई बार फोन करने पर बेचारा टेलर आ कर उसे रिक्शा से ही वापस ले गया।

साशा को कुछ निराशा हुई होगी लेकिन बाकी सबने चैन की साँस ली।

साशा बहुत अधिक शैतान थी। हर समय मस्ती करती रहती। एक दिन कुछ देर उसकी आवाज नहीं आई तो हम देखने बाहर निकले।

देखा तो चकित रह गये। साशा के पास एक बहुत बड़ी सी गोह थी। जिसे घोरपड या monitor lizard भी कहते हैं। लगभग तीन फुट लम्बी, बेहद झुर्री दार बड़े से गिरगिट की तरह लग रही थी।

देखने में तो ऐसा लग रह था मानों दोनों आपस में खेल रहे हों। हमें देखते ही वह गोह एक कमरे में घुस कर अलमारी के नीचे छिप गई। उसे निकालने में जो कुछ शोर-गुल हुआ, काफी लोग इकट्ठे हो गए।

मैने सबको धमकाया कि ये हमारी घोरपड है इसे कोई हाथ नहीं लगाएगा। लेकिन कहते हैं कि घोरपड बहुत महँगी बिकती है। आसपास काम करने वाले मजदूरों ने रातों रात उसे गायब कर दिया।

एक दिन सुबह-सुबह हमारे केयरटेकर का फोन आया कि मेरे घर में साँप है। पिछले अनुभव से मैं सावधान थी। इसलिए पूछा कैसा दिखता है।

उसने बताया कि “मैं कुछ दिन की छुट्टी ले कर तीर्थ यात्रा पर गया था। घर लौटा तो चूल्हे के पास से फुस्स फुस्स की आवाज आ रही थी। देखा तो साँप है। और वो तो भगवान का ही साँप है। उस पर भगवान का डिजाइन है।”

“तो तुमने क्या किया ?” मैने पूछा।

“मैं क्या करूँगा। वो तो भगवान का नागोबा है। मैं कुछ दूर हाथ जोड़ कर बैठा हूँ।”

भगवान का डिजाइन मतलब नाग होने की संभावना थी। उसे उसी तरह हाथ जोड़ कर साँप पर नजर रखने को कह कर,  मैने तुरंत सर्प मित्र को फोन किया। उसे वहाँ का पता दे कर मैं भी अपना कॅमेरा ले कर निकल पड़ी। मेरे पहुँचने तक साँप पकड़ा जा चुका था। बड़ा ही हँडसम और जवान नाग था।

उसके बाद तो सर्प मित्र को इतनी बार हमारे फार्म पर आना पड़ता, कि वो हमारा भी मित्र बन गया।

हालंकि मुझे साँप बेहद पसंद है लेकिन बच्चे कहीं भी घुमते रहते। आए दिन निकलने वाले साँपों के कारण शाम से ही कुछ चिंता सी लगी रहती थी। कभी-कभी तो सुबह कई जगह मिट्टी पर साँप के निशान दिखते।

तो मैनें तय किया कि अब हमें मुंगुस पालना चाहिए।

… तो अगली बार रानी मुंगुस, बंटी, बबली और स्नो

 

One thought on “दोस्ताना-5

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  1. दोस्ताना के पांचों भाग आज पढ़े । बहुत मज़ा आया। तेरे साथ बचपन गुज़रा है इ सलिए कुछ किस्से सुने हुए भी थे । लगा कि तू सामने बैठकर किस्से सुना रही है। भाई वाह । बढ़िया है।

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