दोस्ताना- ४


             शेरी 

कई बार मुझे विश्वास होने लगता है कि सारे रिश्ते-नाते, छोटी-मोटी घटनाएँ ये किसी तयशुदा बड़ी सी दैवी योजना का हिस्सा होती हैं। जब भी मैं पीछे मुड़कर कोई घटनाक्रम देखती हूँ, तब इस बात का एहसास अधिक होता है कि अरे!! सब बातें ऐसे हुईं मानों पहले से तय थीं। ये एहसास ज़िंदगी में एक बार नहीं, कई बार होता है।

 शेरी का हमारे जीवन में आना भी मानों ऐसी ही एक घटना थी।

बच्चे कुछ बड़े हो चुके थे, और हम चाहते थे कि उनके लिए कोई प्राणि मित्र लाया जाए।

ये तो तय था कि प्राणि ऐसा हो जो बच्चों से अपना बचाव खुद कर सके।
उसी दौरान वन हंड्रेड एंड वन डालमेशियन वाली फिल्म आई। बच्चों को वो फिल्म बेहद पसंद आई। हमने तय किया कि एक डालमेशियन ही लाया जाए। हालांकि हम हॉस्पिटल में रहते थे ,लेकिन हमारे घर में एक काफी बड़ा पॅसेज था और एक बहुत बड़ी सी छत भी थी।

आई का इस पर सख्त विरोध था। उन्होंने वही पैंतरा अपनाया, जो घर-घर में प्राणियों के विरोधी अपनाते हैं।

“इस घर में या तो मैं रहूँगी या कुत्ता।”

हमारे कुछ कहने से पहले ही नील, जो लगभग पाँच साल का था, और हर बार गलत समय पर गलत बात कहने के लिए पहले ही मशहूर था, तुरंत बड़ी मासूमियत से बोल पड़ा,

“आजी अब आप कहाँ जाओगी?”

आजी बहुत नाराज हुई, लेकिन हम लोग टस से मस नहीं हुए। उन्हें मैने इस बात का विश्वास दिलाया कि मैं कुत्ते को इस तरह ट्रेन करूँगी कि वो उनके आसपास भी ना जाए। उन्हें मंजूर नहीं था,लेकिन क्या करतीं? उनके अलावा बाबा सहित घर के सभी लोग कुत्ता लाने की कल्पना से बहुत रोमांचित थे।

कोल्हापूर में किसी ब्रीडर के पास डालमेशियन्स थे। उसके एक पिल्ले को उसने हमारे लिए कार से पुणे भेजा। हम सब बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।

शाम को फोन आया कि पिल्ला बहुत छोटा था। सफर नहीं सह पाया।

बच्चों ने रोना शुरू कर दिया। धनंजय ने वॅटरनरी डॉक्टर गोरे को फोन किया। वह बोले डालमेशियन तो नहीं,लेकिन एक लॅब्राडॉर है। उनके यहाँ वॅक्सीन लगवाने आया करती थी।

एक बंगाली परिवार है, उनकी ढाई साल की कुत्ती है। वे उसे किसी को देना चाहते हैं। हम चाहें तो उसे तुरंत ही ले आएँ।

ढाई साल की? क्यों दे रहे होंगे? शायद कटखनी होगी। इतना बड़ा कुत्ता अचानक दूसरे के घर कैसे रहने लगेगा? और क्या वो खुद रह पाएगी? कुत्ते तो वैसे ही इतने वफादार होते हैं कि मालिक की याद में जान दे देते हैं। कितनी ही कहानियाँ सुनते आए हैं हम बचपन से।

बच्चों को काटा लिया तो?

मेरे मन में हजार शंकाएँ थीं। मैने तय किया कि हमें छोटा ही कुत्ता चाहिए। शुरु से खुद ही उसे बड़ा करेंगे तभी वो भी हमें अपना समझेगा।

डॉक्टर गोरे ने बताया कि उन लोगों को अक्सर शहर से बाहर जाना पड़ता है। कुत्ते के लिए खाना पानी रख कर जाते हैं । कई कई दिन तक वह अकेली घर में रहती है।

सुन कर धनंजय को बेहद बुरा लगने लगा। ये कौन सा तरीका है कुत्ता पालने का? उसे लगा कि एक बार जा कर देख तो आएँ, चाहे फिर ना लें।

रही बात वफादारी वाली कहानियों की, तो डॉक्टर का कहना था कि वह सब सिर्फ कहानियों में ही होता है। जहाँ कहीं अच्छी देखभाल होती है, कोई भी कुत्ता खुशी खुशी वहाँ रहने लगता है। और उनकी याददाश्त बहुत लम्बी भी नहीं होती। बहुत सी बातें यदि बार बार ना दोहराई जाएँ तो वे भूल जाते हैं।

हम उनके घर पहुँचे। शेरी को उन्होंने बाँध रखा था। आमतौर पर लॅब्राडॉर जगत मित्र होते हैं, लेकिन वे बोले कि शेरी को नये लोगों से दोस्ती करने में कुछ समय लगता है।
जब उन्होंने शेरी को लाया था, तब उनकी परस्थिती कुछ अलग थी। बाद में उनका एक ऍक्सिडेंट हुआ। उस दौरान शेरी को कुछ महीने उन्होंने किसी ट्रेनर के पास रख दिया गया था। उनकी जानकारी के बिना उस ट्रेनर ने शेरी की मेटिंग करा के उसके बच्चे भी बेच दिए। जब वे उसे वापस ले कर आए तब शेरी की हालत कुछ ठीक नहीं थी। उसके मालिक की आर्थिक हालत भी शायद पहले जैसी नहीं रही थी।

वे शेरी की तरीफों के पुल बाँध रहे थे कि किस तरह वह एक हफ्ता भी अकेली घर में रह सकती है। उस दौरान धनंजय निरंतर शेरी से बात कर रहा था। शेरी उसकी तरफ देख कर लगातार भौंक रही थी। भीतर किचन में उनकी पत्नी और बेटी रो रहे थे।

मैने अंदर जा कर उनसे बात की। वो दोनों नहीं चाहती थीं कि शेरी जाए। उन्होंने बताया कि उनके आपसी झगड़ों में कभी पति ने उन पर हाथ उठा दिया था,और शेरी ने लपक कर उनका हाथ पकड़ लिया था। तब से वे उससे कुछ डरने लगे थे।

धनंजय ने शेरी को खोलने के लिए कहा। वे उससे बांगला में बात कर रहे थे। उसे समझा कर उन्होंने खोला, और इतनी बड़ी कुत्ती सीधे जा कर धनंजय की गोद में चढ़ कर बैठ गई।

उसे मानों सब कुछ समझ में आ गया था। न जाने कैसे उसे ये पता चल गया था कि इस घर में अब अपने लिए जगह नहीं है। उसने खुद ही निर्णय ले डाला, कि वह धनंजय के साथ जाना चाहती है। धनंजय तो जैसे बिल्कुल भाव विभोर हो गया। हम जब उनके घर से बाहर निकले तो धनंजय ने शेरी से पूछा कि आना है क्या मेरे साथ। उसने जैसे ही गाड़ी का दरवाजा खोला वो अपने मालिक से पट्टा छुडवा कर दौड़ती हुई आई और गाड़ी में घुस गई।

उनका पूरा परिवार रोने लगा। फिर तय हुआ, कि वे खुद ही उसे छोड़ने आएंगे। अगले दिन वे अकेले ही शेरी को छोड़ने आए। साथ में उसका इतना समान था कि बस! उसके पास बैठ कर वो बच्चों की तरह फूट फूट कर रोए।

चाहे जो वजह रही हो उनकी शेरी को छोड़ने की, लेकिन उन सबको शेरी से प्यार बहुत था, ये तो निश्चित है।

शुरू शुरू में धनंजय के सिवा हममें से किसी की हिम्मत नहीं थी उसे हाथ लगाने की।

धनंजय स्वघोषित प्राणि मित्र है और उसका ऐसा विश्वास है कि दुनिया के सभी पशु-पक्षी उसे अपना समझते हैं।

इसलिए वह आम तौर पर किसी भी प्राणि से नहीं डरता। वो बड़े आराम से जाकर शेरी के पास बैठता। वो भी उससे खूब लाड़ करवा लेती।

बच्चों को कोई समझ ही नहीं थी, तो वो भी मजे में उसके आस-पास खेलते। हाथ लगाने से लेकिन डरते। पहले दिन हॉस्पिटल जाने से पहले धनंजय शेरी को बाँध कर गया, तो उसने भौंक भौंक कर सारा घर सर पर उठा लिया।

उसे खुला छोडा तो पूरे समय मेरे पीछे पीछे घूमती रहती। उसके साथ भाषा की समस्या भी थी। वह सिर्फ बंगाली और अंग्रेजी जानती थी।

लेकिन उसे एक-दो बार मैनें किचन में आने से मना किया और वह तुरंत समझ गई। किचन के दरवाजे के पास आते ही उसके पैरों को ब्रेक लग जाता। दरवाजे के बाहर बैठ कर मुझ पर नजर रखती।

पहले दो-तीन दिन जब किसी का ध्यान नहीं होता, तब बाथरूम के दरवाजे के बाहर वह चुपचाप से पॉटी वगैरह कर लेती। जब मैं उसे डाँटती, तो गुर्रा कर मुझे दाँत दिखाती।

बच्चे स्कूल से आते ही उसके पीछे लग जाते। हमारे घर का बीच का पॅसेज उनके फुटबॉल खेलने की पसंदीदा जगह थी। उन्होंने फुटबॉल खेलना शुरू किया कि शेरी भी उनके साथ खेलने दौड़ पड़ती।

जब दो दिन में दो फुटबॉल उसके नुकीले दाँत कर लग कर फूटे तो सागर बहुत नाराज हुआ। उस पर शेरी के पास बॉल जाते ही वह बॉल पर कब्जा कर के बैठ जाती। वापस देती ही नहीं थी। उसके खयाल से उससे बॉल छुड़वाना ही मुख्य खेल था। उसके पास जाने पर गुर्राती। तो एक बार बॉल छुड़वाने के लिए सागर ने एक बिसलरी की खाली बोतल फेंक कर शेरी को मारी। शेरी उस बोतल को ही पकड़ कर बैठ गई।

उसके बाद जब बच्चे फुटबॉल खेलने लगे तो शेरी मुँह में बोतल पकड़ कर उनके साथ खेलने लगी। इस सारे खेल में न जाने कैसे शेरी और बच्चों ने ये खोज निकाला कि यदि फुटबॉल खेलते समय शेरी के मुँह में वह प्लास्टिक की बोतल हो तो वह बाकायदा इंसानों की तरह पैरों से बॉल खेलती है।उसके दाँत बॉल को नहीं लगते।

उसके बाद तो जब कभी सागर, नील बॉल को बस पैर लगाते और शेरी दौड़ कर अपनी बोतल उठा लेती। उसके बाद वो बच्चों के साथ फुटबॉल के साथ साथ छुपा छुपी भी खेलने लगी। वो कहीं भी जा कर छुपें शेरी ढूँढ निकालती।

उसे रोज हॉस्पिटल के बीच से घुमाने ले जाना संभव नहीं था। मैं चाहती थी कि वह छत पर ही अपने नित्यकर्म करे। हमारी छत पर जाने की सीढ़ी लोहे की थी, जिससे नीचे का भी दिखाई देता था। शेरी को उससे बहुत डर लगता। वो थर थर कांपने लगती। फिर एक दिन धनंजय उसे गोद में उठा कर छत पर ले गया। छत बहुत बड़ी थी। वहाँ शेरी बच्चों के साथ खूब खेली। उसके बाद वो खुद ही ऊपर जाने लगी।

उसके लिए मैनें छत का एक कोना तय किया। फिर मैं उसे पट्टे से बांध कर तब तक वहाँ खड़ी रहती जब तक वह पॉटी न कर लेती।

कुछ ही दिन में वह समझ गई और फिर सिर्फ उसी कोने में जाने लगी।

एक बार उसकी पुरानी मालकिन और उनकी बेटी शेरी से मिलने आए। शेरी पहले तो उन पर बहुत भौंकी। फिर उनकी गोद में सर रख कर बैठ गई। वो दोनों माँ बेटी बाहुत भावुक हो कर रोने लगीं , तो शेरी की आँखों से भी आँसू आने लगे। कहते हैं कि कुत्तों के अश्रु ग्रंथियाँ नहीं होती, लेकिन मैने शेरी को रोते हुए विडिओ रेकॉर्ड किया है। जब वे जाने लगीं तो शेरी अंदर जा छुपी। वहाँ से लगातार भौंकती रही लेकिन बाहर नहीं आई।

उसके बाद उसने हम चारों को अपने परिवार में शामिल कर लिया।

उसके साथ एक समस्या थी। यदि सामने से सीधे कोई हाथ बढ़ा कर उसे हाथ लगाने की कोशिश करते तो उसे बहुत गुस्सा आता। एकदम से हाथ पकड़ लेती थी। दूसरे, उसे गलती से भी किसी का पैर लगाना पसंद नहीं था। पास बैठी हो और आप पैर से सहला दो तो भी नाराज हो जाती। इसके अलावा यदि उसके सामने अखबार लपेट कर पकड़ा जाए तो भी नाराज हो कर भौंकने लगती।

बहुत सी बातें थीं जो उसे सख्त नापसंद थी। लोगों को मालूम ना होने के कारण कई लोगों को उसके दातों का प्रसाद मिला। वेटरनरी डॉक्टर का कहना था कि उसके ट्रेनर ने उसके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया था।उसके जीवन के अनुभवों की वजह से उसका मनुष्य पर बहुत विश्वास नहीं था।

लेकिन हम चारों और बाबा कुछ भी करें उसने कभी हमें दाँत नहीं लगाए।

बच्चे आपस में खूब झगड़ते, शेरी आँख उठा कर भी नहीं देखती। लेकिन कभी मैं या धनंजय उन पर जरा भी चिल्लाए तो हमारे सामने डट कर खड़ी हो जाती और गुर्राती। हमारा बच्चों से ज़रा भी ऊँची आवाज में बात करना उसे नामंजूर था। बच्चों को जब इस बात का पता चला तो जैसे ही हमारा आवाज चढ़ता वो "शेरी बचाओ" कह कर चिल्लाने लगते।

धनंजय पर उसका प्रेम नहीं बल्कि अनन्य भक्ति थी। उसे वेटरनरी डॉक्टर से डर लगता था। उन्हें देखते ही उसके सारे बाल खडे हो जाते और वह दाँत निकालने लगती। लेकिन धनंजय साथ होता तो उसके कहने पर चुपचाप खुद उनके टेबल पर चढ़ कर बैठ जाती।

एक बार हम एक नदी के किनारे खडे थे। धनंजय ने यूँ हीं एक लकड़ी का टुकड़ा पानी में फेंका और शेरी से कहा ले कर आ। शेरी इसके पहले कभी भी तैरी नहीं थी। हम जानते भी नहीं थे कि उसे तैरना आता भी है या नहीं। बस सुना था कि सभी जानवर पैदाइशी अच्छे तैराक होते हैं। शेरी पानी में कूदी। कुछ देर किनारे के पास ही छपाक छपाक करती रही और दो ही मिनिट में उसे इतना आत्मविश्वास आ गया कि  मजे में तैरने लगी। कुछ दूर तक गई और जब उसे वह लकड़ी कहीं नज़र नहीं आई तो उसने पानी में उगी लम्बी घाँस का एक टुकड़ा मूँह से तोड़ा और वापस ले आई। इस समय भी नसीब से मेरे हाथों में विडिओ कॅमेरा था। बड़ी मजेदार फिल्म बनी।

एक बार हम शेरी को साथ ले कर कोंकण गये थे। बच्चे समुद्र के पानी में खेल रहे थे। शेरी वहीं किनारे बैठी देख रही थी। हमारे लाख बुलाने पर भी वह पानी के पास आने को तैयार नहीं थी। कुछ देर बाद धनंजय आया और सीधा समुद्र में तैरने चला गया। शेरी उठ कर खड़ी हो गई। जैसे जैसे वो पानी में अंदर अंदर जाने लगा वैसे ही वो बेहद चिंतित हो कर भौंकने लगी। उसने पहले तो भौंक भौंक कर मुझे बताने की कोशिश की कि उसे रोको। लेकिन कुछ देर बाद वो जब दिखना ही बंद हो गया तो आखिर उसने सारा डर छोड पानी में छलांग लगा दी। हर बड़ी लहर आने पर बेचारी के खुले मूँह में ढेर सा पानी जाता। लेकिन वो कुछ ही देर में धनंजय के पास पहुँच गई। इतना डर लगने के बाद भी जब तक वो तैरता रहा तब तक वो भी उसके साथ तैरी। इतना नमकीन पानी पी गई थी कि जब वापस लौटी तो उसे बहुत उल्टियाँ हुईं। लेकिन उसके बाद से शेरी पक्की तैराक बन गई। जहाँ मौका मिलता तैर ही लेती। शेरी लॅब्राडॉर रिट्रीवर होने की वजह से कुछ भी फेंको , वो वापस उठा कर लाना उसके स्वभाव में ही था। एक बार मैं और वो हमारे फार्म पर घूम रहे थे। अचानक कुछ भैंसे घुस आईं। मैने उन्हें भगाने के लिए एक पत्थर उठा कर मारा। शेरी भी भौंकते हुए पूरे जोश से उनकी तरफ भागी। मेरे पत्थर की तरफ उन भैंसों ने ध्यान भी नहीं दिया था। लेकिन शेरी को देख कर उनमें कुछ भगदड़ मच गई। लेकिन शेरी ने ना इधर देखा ना उधर। तीर की तरह गई, सीधे मैनें फेंका हुआ पत्थर उठाया और वापस ला कर मुझे दिया। भैसें भी हैरान हो गईं कि ये क्या चल रहा है। समय का ना जाने कैसे उसे विशेष ज्ञान था। वो दिन भर घर में बैठ कर उकता जाती इसलिए बाबा ने उसे अपने साथ नर्सरी पर ले जाना शुरू किया। उसे वहाँ पेड़ों के बीच तितलियों के पीछे घुमते रहने में मज़ा आता। रोज़ सुबह ठीक साड़े नौ बजे बाबा के सामने उनकी बॅग और अपना पट्टा ला कर रखती और दरवाजे की तरफ देख कर भौंकने लगती। बच्चों के स्कूल से आने का समय होते ही दरवाजे के पास जा कर बैठ जाती। धनंजय का तो हॉस्पिटल से आने का कोई निश्चित समय भी नहीं था,लेकिन हमेशा ना जाने कैसे उसके आने से पाँच मिनिट पहले वो दरवाजे के पास जा कर बैठ जाती। शेरी नियम कि बेहद पक्की थी। जो बात एक बार उसे समझा दी जाती वो उसके दिमाग में हमेशा के लिए फिट हो जाती। जैसे बिना पट्टा लगाए घर के बाहर नहीं जाना है तो नहीं जाना है।यदि हम बिना पट्टा लगाए ही उससे कहते कि चल शेरी ,तो वो दौड़ कर मूँह में पट्टा उठा लाती। और यदि किसी ने वह उसकी गर्दन में नहीं बाँधा तो खुद ही वह पट्टा मूँह में ले कर चलती। नील कहता शेरी खुद ही खुद को घुमाने ले जाती है। किचन में जाना मना है तो चाहे कोई भी प्रलोभन हो वो किचन के दरवाजे पर रुक जाती। जब हम नये घर में शिफ्ट हुए तो उसके लिए एक अलग से एक खास बाथरूम बनवाया गया। एक बार बाथरूम में जाना है यह समझ में आने के बाद उसने कभी भी रास्ते पर या बाहर गंदगी नहीं की। कितनी भी जोर से पॉटी या शू लगती बेचारी कूँ कूँ करती रहती। घर पहूँचते ही दौड़ कर बाथरूम में जाती। घर के बाहर का दरवाजा हमेशा बंद रहना चाहिए। यदि कभी वह खुला रह जाए तो वहीं दरवाजे के बीचों बीच बैठ कर एक अलग तरह से भौंकती रहती जब तक कोई दरवाजा बंद नहीं कर देता। दीनानाथ हॉस्पिटल बनना शुरू हुआ, तब धनंजय अक्सर उसे अपने साथ वहाँ ले जाता। उसे एक बार समझाया गया कि हॉस्पिटल के अंदर आने की उसे अनुमति नहीं है। तब हमारे पास बॅलेनो अल्टूरा नामक एक बहुत बड़ी डिक्की वाली  गाड़ी थी, जिसमें शेरी बड़े आराम से बैठती थी। यदि वो गाड़ी में अकेली होती तो धनंजय गाड़ी की डिक्की खुली छोड़ कर अपना काम करने अंदर चला जाता। शेरी बाहर यहाँ वहाँ लॉन पर खेलती रहती। ऊब जाती तो अपने आप जा कर गाड़ी में बैठ जाती। किसी को गाड़ी के आस पास भी नहीं फटकने देती। कभी कभी धनंजय को अधिक देर लगती तो जा कर हॉस्पिटल के दरवाजे के सामने बैठ कर उसका इंतज़ार करती, लेकिन कभी गलती से भी वो अंदर नहीं गई। कोई उसे हाथ लगाने की कोशिश करता तो गुर्राती। लोग बड़े आश्चर्य से उसे देखते। शेरी की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह बोला हुआ हर शब्द समझने लगी थी। उसे कुछ भी बताने के लिए हाथ हिलाने या इशारे करने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। कई बार तो मुझे लगता कि वो मन की बात भी बिना कहे समझ जाती है। अक्सर मेरे मन में विचार भर आता कि उसे कुछ खाने को देना है और वो उठ कर अपनी प्लेट के पास पहुँच जाती। शेरी की वजह से मेरा इस बात पर पूरा विश्वास हो गया है कि जानवरों को इंसानों से कुछ अधिक संवेदनाएँ प्राप्त हैं। वे टेलीपॅथी जानते हैं इस पर तो मुझे पक्का भरोसा है। और मेरा ऐसा मानना निराधार भी नहीं है। फार्म लेने के बाद आई बाबा कुछ दिन वहाँ रहने गये। अकेले डर लगता इस लिए साथ शेरी को भी ले गये। शेरी को वहाँ खुली हवा में रहना इतना अधिक पसंद आया कि उसके बाद जब भी वो पुणे के फ्लॅट में आती बहुत ऊब जाती। घर में बैठ कर अखबार के बारीक बारीक टुकड़े कर देती। कुछ दिनों बाद तो वह शेरी जो गाड़ी में घूमने की इतनी शौकीन थी, फार्म से वापस आते समय गाड़ी में चढ़ने को तैयार ही नहीं होती। फिर आई बाबा तो वापस आ गये, लेकिन शेरी वहीं रहने लगी। एक बार मैं इंदौर जाने वाली थी। दोपहर 1.30 की मेरी बस थी। मैं सारा सामान बाँध कर तैयार थी और अचानक ना जाने क्यों मेरे मन में यह खयाल बार बार आने लगा कि एक बार शेरी से मिल कर आना चाहिए। मैनें दस बजे के करीब फार्म के केयरटेकर को फोन कर शेरी के बारे में पूछा, तो वो कहने लगे कि वो जमीन से मूँह लगाए सुबह से बिल्कुल चुपचाप लेटी है। शायद उसका पेट खराब है। मैनें सोचा कि मुझे जा कर एक बार उससे मिल ही लेना चाहिए। तो मैं तुरंत ही फार्म के लिए निकल पड़ी। वहाँ पहुँची तो देखा शेरी बिल्कुल निश्चल पड़ी थी। उसकी आँखें भी बिल्कुल निस्तेज लग रही थीं। मुझे देख कर उसने लेटे लेटे ही बड़ी मुश्किल से पूँछ हिलाई और बेहोश हो गई। मैनें उसे एक चादर में लपेट कर गाड़ी मे डाला। डॉक्टर को फोन किया कि मैं उसे लेकर आ रही हूँ। और फिर धनंजय को फोन किया। वो हमेशा की तरह ऑपरेशन में व्यस्त था। उससे बात नहीं हो पाई। डॉक्टर के यहाँ पहुँचने पर मैने ड्रायवर को मेरे टिकिट कॅन्सल करने के लिए भेज दिया। शेरी की अवस्था बहुत खराब हो चुकी थी। उसे तेज बुखार था। और वह बेहोश थी। उसके मूँह से झाग भी आ रहा था। डॉक्टर ने बताया कि उसे शायद टोड खाने की वजह से विषबाधा हो गई थी। उसकी अवस्था इतनी खराब थी कि उसके बचने की कोई संभावना ही नहीं थी। कुछ देर सलाइन लगाने के बाद उन्होंने कहा उसे अस्पताल में रख कर कोई फायदा नहीं है। शायद वो शाम तक दम तोड़ दे। तो मैं उसे घर ले जाऊँ यही बेहतर होगा। मैने वहाँ से धनंजय को फिर फोन किया। उसने डॉक्टर से बात की। मैं शेरी को घर ले आई। धनंजय सलाइन की बोतल और कुछ एंटी बायोटिक्स ले कर आया और उसने शेरी को सलाइन से इंसानों की ही दवाइयाँ देना शुरू किया। मैं ठंडे बर्फिले पानी से उसका शरीर पोंछती रही। रात भर हम बारी बारी उसके पास बैठे रहे। दो दिन बाद उसने आँखे खोलीं। उसके शरीर में नलियाँ लगी हुई थीं। उसमें हिलने की भी ताकत नहीं थी ,लेकिन दाँत से नली काँटने लगी। जब धनंजय ने उसे समझा कर बताया कि ये बहुत जरूरी है, तो वह समझ कर शांत हो गई। करीब पाँच दिन तक उसे उठना भी मुश्किल था। जहाँ थी वहीं पड़ी पड़ी पॉटी से ले कर उल्टी तक सब कर रही थी। उसकी उसे भी शायद बहुत शर्म आ रही थी। पाँचवे दिन बड़ी मुश्किल से उठ कर गिरते पड़ते उसने उसके बाथरूम तक जाने की कोशिश की। एक महीने में वह पहले की तरह स्वस्थ हो गई और उसके बाद सात साल जीवित रही। मुझे पूरा विश्वास है कि उस दिन जब वह बहुत बीमार थी तब उसने ही टॅलीपैथी से मुझसे संपर्क किया और मेरे मन में उसे देखने की इतनी जबरदस्त इच्छा उत्पन्न हुई। वरना  गाड़ी छूटने से कुछ देर पहले मैं उसकी बीमारी की कोई खबर ना होते हुए भी 30 किलोमीटर दूर फार्म पर उससे मिलने क्यों जाती। उसके बाद हम दो और ऑलसेशियन कुत्ते लाए। शेरी ने कभी उन्हें बहुत महत्व नहीं दिया। नील का कहना था कि एक तो वे बिल्कुल छोटे बच्चे हैं और उस पर वो काले हैं और शेरी गोरी हैं। इसलिए वह उन्हें तुच्छ समझती है। शेरी ने घर के सदस्यों को भी क्रम दे रखा था। धनंजय उसके लिए घर का सबसे महत्वपूर्ण सदस्य यानि अल्फा डॉग था। उससे उसका बर्ताव बिल्कुल अलग था। मुझ पर नितांत प्रेम था, लेकिन धनंजय जितना आदर नहीं था। सागर को वह अपने बराबर का समझती थी। और नील को अपने से कम समझती थी। इसलिए अक्सर उसकी बातों और आदेशों की तरफ ध्यान भी नहीं देती थी। उम्र बढ़ने पर उसकी तकलीफें बढ़ने लगी। उठते बैठते उसे परेशानी होती। कुछ बीमार थी और लगभग साड़े ग्यारह साल की थी, जब उसने खाना पीना बंद कर दिया। मैने जबरदस्ती उसे खिलाने की कोशिश की तो गुर्राने लगती। सिर्फ पानी पीती। घर आने से उसने इंकार ही कर दिया। फार्म पर ही रहती थी। बार बार उठ कर दूर खेतों में जा बैठती। मैं उसे चादर में डाल कर उठा कर वापस घर के पास ले आती, वो बड़ी मेहनत से फिर वापस चली जाती। फिर हमने पढ़ा कि जानवर कभी भी अपने परिवार के सामने प्राण त्यागना पसंद नहीं करते। इससे सबका मनोधैर्य कम होता है। समय आने पर वे एकांत में कहीं जा बैठते हैं। फिर एक दिन जब हम फार्म पर उससे मिले तब उसकी आँखों में ऐसे भाव थे कि मानो कह रही हो कि बस ये अब अपनी आखरी मुलाकात है। दूसरे दिन सुबह सुबह उसने अपनी अंतिम साँस ली। अगली बार बँटी,बबली,स्नो और साशा...  

6 thoughts on “दोस्ताना- ४

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  1. Swati
    Sherrywarcha lekh aaj wachla. Khupach chan lihile aahes. Very touching. Mala aamchya mylochi aathawan zali. Tyane pan 13 warshe aamhala khup aananda dila. We miss him so much .you are very lucky to have so many pets.

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