दोस्ताना -२




रॉकी

सुबोध का प्राणी प्रेम कम होने का नाम नहीं ले रहा था। आखिर एक कुत्ता लाने का विचार किया गया।

पप्पा के किसी परिचित की ऑलसेशियन कुतिया को पिल्ले हुए थे। पिल्लों का पिता देसी था, लेकिन बच्चे देखने में बड़े खूबसूरत थे।

हम तो देखते ही फिदा हो गये।

और इस तरह रॉकी की शक्ल में एक मुसीबत हमारे घर आ पहुँची।
 

रॉकी दिखने में बहुत प्यारा था, बस एक ही गड़बड़ थी। उसकी गर्दन थोड़ी टेढ़ी थी, जिसकी वजह से वह हमेशा ही कुछ सोचता सा नज़र आता था।

पता नहीं क्रॉस ब्रीड होने की वजह से था, या सुबोध के उसे हमेशा तंग करते रहने की वजह से था, लेकिन रॉकी जैसे जैसे बड़ा होने लगा उसका स्वभाव अधिक अधिक सनकी होता गया।

सुबोध को किसी दिन अचानक पता चला कि रॉकी को टॅलकम पावडर की खुशबू से छींके आती हैं। वह उसके पास पावडर लगा कर जाता। रॉकी छींकता रहता।

उसकी पूँछ मे एक रबर बँड लगा देता, वो बेचारा देर तक वह रबर निकालने के लिए अपनी ही पूँछ पकड़ कर गोल गोल घूमता रहता।

सुबोध उसके सामने अजीब चेहरे बना कर,हाथ हिला कर गुरगुराता, और रॉकी को बेहद चिढ़ होती। वो भौंक भौंक कर सारे मुहल्ले को पागल कर देता।

उसे गंदे,मैले कुचैले भिखारियों से विशेष प्रेम था। वे आते तो दुम हिला कर स्वागत करता। लेकिन किसी अच्छे भले उपयोगी इंसान के पास जा कर खड़ा रहता और बिना किसी पूर्व सूचना के काट लेता। डाकिया हमारे पत्र पड़ौसी के घर देने लगा था।

नहाने से उसे नफरत थी। ना जाने कैसे उसे समझ में आ जाता कि आज उसे नहलाने का विचार किया जा रहा है। जंजीर तोड़ कर भागता और पूरा दिन छुपा रहता।

उसे मटन-चिकन बेहद पसंद था, जो हमारे घर बनता नहीं था। मुहल्ले में किसी के घर भी नॉनवेज बनता तो रॉकी को उसकी खुशबू आ जाती। वो जंजीर तोड़ कर भागता। लोग दरवाजा बंद कर के मटन चिकन पकाने और खाने लगे थे। तब वह उनके घर की खिड़की पर चढ़ कर भौंकता रहता। लोग कहते कि उसके डर से उन्हें अपने ही घर में छुप कर खाना खाना पड़ता है।

उसके लिए भैंस को बाँधने वाली जंजीर लाई गई। लेकिन उसके बदन में, या फिर मटन की खुशबू में इतनी ताकत थी, कि वो इतनी मोती ज़ंजीर भी हमारा रॉकी तोड़ देता।

उस पर एक तमाशा और खड़ा हो गया। घर के पास के एक मकान में एक नये किराएदार रहने आए। हमारी या उनकी बदकिस्मती से उनके दो-ढाई साल के बेटे का नाम भी रॉकी था।

सारा दिन किसी ना किसी वजह से उस रॉकी की माँ अपने रॉकी को आवाज लगाती और हमारा रॉकी भौंक भौंक कर परेशान हो जाता।

आए दिन हमारे घर के सामने उसके शिकार व्यक्ति लड़ने आ खड़े होते।

एक दिन कोई तैश में बोला कि मेरा तो मन करता है इसे जहर दे दूँ।

तब तक पप्पा लोगों को जवाब दे दे कर और आए दिन नई ज़जीरें खरीद के इतने तंग आ गये थे कि बोले

“मन तो मेरा भी करता है, पर मुझसे नहीं दिया जाएगा। तुम चाहो तो खुद कोशिश कर के देख लो।”

फिर उन्होंने सचमुच रोटी में कोई जहर मिला कर रॉकी को रोटी खिलाने की कोशिश की।

रॉकी ने नहीं खाई। उन्होंने कई अलग अलग चीज़ें ला कर उसे खिलाना चाहा, लेकिन खाना तो दूर उनका मटन भी रॉकी सूँघता तक नहीं था। आखिर उन्होंने तंग आ कर हमारे घर के सामने वाले रास्ते से जाना बंद कर दिया।

फिर रॉकी को एक नया शौक लग गया।

भोपाल में मुस्लिम आबादी बहुत होने के कारण बुरक़ा पहनी महिलाएँ दिखना आम बात थी। लेकिन बुरक़ा देखते ही रॉकी के बदन में जोश आ जाता। वो एकदम जी जान लगा कर अपनी जंजीर तोड़ता और जा कर बुरक़ा पकड़ लेता। बुरक़े वाली बेचारी डर के चीखती , पीछे से हम रॉकी के नाम से चीखते। अच्छा खासा तमाशा खड़ा हो जाता। जाने कितने बुरक़े फाड़े रॉकी ने।

लोग यहाँ तक कहने लगे कि हमने उस जान बूझ कर बुरक़े वालियों को तंग करना सिखाया है।

एक बार पप्पा के एक मित्र हमारे घर आए। रॉकी उनसे आश्चर्यजनक तरीके से अच्छी तरह पेश आया। वे कुछ देर उससे खेलते रहे। फिर बोले इतना प्यारा कुत्ता है। बिना वजह बेचारे को बदनाम कर रखा है।

पप्पा ने कहा “ तो तुम ले जाओ ”

वे सचमुच ले गये। तीन चार दिन में वापस ले आए। कहने लगे कुत्ता नहीं ये तो राक्षस है।

रॉकी को एक दो बार कहीं कहीं ले जा कर छोड़ने की कोशिशें भी हुईं। लेकिन वो वापस  गया।

अंत में सिर्फ सुबोध ही एक बाकी रह गया था, जो कई बार उसके दाँतों का प्रसाद पा कर भी, रॉकी से अब भी सचमुच प्रेम करता था।

हम सब तो इस कदर तंग आ गये थे कि किसी भी तरह उससे पीछा छुड़ाना चाहते थे।

फिर एक ही दिन में रॉकी ने सुबोध सहित दो तीन लोगों को काटा। और फिर यह निर्णय लेना आसान हो गया कि रॉकी किसी भी तरह से घर में रहने के लायक नहीं है।

पप्पा के किसी क्लाइंट को उसके खेत में रखवाली करने के लिए ऐसे ही किसी खतरनाक कुत्ते की ज़रूरत थी। पप्पा और रोता हुआ सुबोध रॉकी को दूर किसी गाँव में उसके खेत पर छोड़ कर आए। वो पीछे पीछे वापस ना आ जाए इसलिए आगे बहुत दूर जा कर दूसरे रास्ते से वापस घर लौटे।

और इस तरह आखिर हमने रॉकी से छुटकारा पाया।




मनी

 

सागर तब दो ढाई साल का था। हम अस्पताल में रहते थे। सागर और पड़ौस में उससे कुछ छोटी अदिती।

ये दोनो बच्चे सारा दिन घर में बैठ कर टॉम एन्ड जेरी देखते रहते।

एक दिन अचानक हेमा ताई ने पूछा कि बिल्ली का बच्चा चाहिए क्या? हमें लगा कि इन बच्चों को खेलने के लिए एक साथी और मिल जाएगा। और मनी हमारे घर आ गई।

बड़ी प्यारी छोटी सी बिल्ली थी।

सागर और अदिती पूरा दिन उसके पीछे घूमते रहते। सागर का कहना था कि बिल्ली उसकी है इसलिए उसे दूध पिलाने से ले कर हर महत्वपूर्ण काम वही करेगा। अदिती को यह मंजूर नहीं था। फिर बिल्ली किसकी, इस बात पर झगड़ा शुरू हुआ। दोनों तरफ से बिल्ली को पकड़ कर खींचा तानी चलने लगी।

मनी अपनी जान बचाने के लिए दोनों बच्चों को नोचती खसोटती, लेकिन 
वो कोई ध्यान नहीं देते थे। जबरदस्ती उसे खिलाते पिलाते। बार बार उठाते। दोनों की खींचातान में उसकी सारी मूँछें टूट गईं थीं। उस बेचारी ने हथियार डाल दिय़े थे।

जहाँ मौका मिलता भागने की कोशिश करती। लेकिन हम अस्पताल में रहते थे। सबको मालूम था कि वो हमारी बिल्ली है। जब घर से बाहर भागने की कोशिश करती कोई ना कोई पकड़ कर वापस ला देता।

एक दिन सागर ने हद ही कर दी। हर समय टॉम एन्ड जेरी देख-देख कर उसके दिमाग में अजीब बातें आने लगी थी। एक दिन उसने तय किया की मनी को साफ करने की ज़रूरत है, और उसे वॉशिंग मशीन में डाल दिया। मैं वहीं थी, इसलिए तुरंत बाहर निकाला। सागर इतना छोटा था कि मशीन चालू नहीं कर सकता था, लेकिन फिर भी यदि किसी का ध्यान नहीं होता तो वो शायद दम घुट कर मर जाती।

मनी को सागर और अदिती से कैसे बचाया जाए हम इसका विचार कर ही रहे थे कि एक दिन वो खुद ही जान बचा कर हमारे घर से भागने में सफल हुई।

उसके बाद कुछ सालों तक हमने किसी प्राणी का विचार भी नहीं किया।


       अगली बार अलादीन- जास्मीन और आते आते रह गया साँप

 

2 thoughts on “दोस्ताना -२

Add yours

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

WordPress.com.

Up ↑

%d bloggers like this: