बाप रे बाप …१६

पप्पा बहुत अपघात प्रवण (accident prone) हैं। खुद ही जा कर अपघातों से टकरा जाते हैं। इतने अधिक जानलेवा हादसे उनके साथ हुए हैं, कि मेरा बेटा नील कहता है

“मैं तो कई बार मरा होता इतने में।”

पहले मैनें सोचा था कि जैसे-जैसे उनकी जीवन कहानी में कोई घटना आएगी, तब उसके बारे में लिखुँगी।

लेकिन ये हादसे और उनके किस्से बहुत अधिक हैं। उनके बारे में सुन-सुन कर ही हम बड़े हुए हैं। तो मैंने सोचा एक बार सिर्फ अपघातों के बारे में ही क्यों ना लिख डालूँ।

पप्पा को भोपाल में नौकरी मिल गई थी। लेकिन शुरू शुरू में उनका भोपाल में मन नहीं लगता था। महीने में कम से कम चार पाँच बार ग्वालियर चले ही जाते थे।

बिना टिकिट सफर करने का शौक तो था ही, लेकिन ट्रक की सवारी में भी बड़ा मजा आता था। जब भी, जैसे भी मौका मिलता निकल ही पड़ते।

जोखिमें उठाना और साहस करना उनका मूल स्वभाव ही है।

उनके पास तो अब भी ट्रक,बस आदि हर तरह के वाहन चलाने का लायसेंस भी है।

वसंत केतकर पप्पा के साथ आरटीओ ऑफिस में ही काम करते थे और आमतौर पर उनके साथ घूमने को तैयार रहते।

जब पप्पा ने बताया कि ग्वालियर जा रहा हूँ, एक पहचान के सरदारजी का बिल्कुल नया ट्रक है, तो केतकर भी चलने को तैयार हो गये।

समस्या सिर्फ यही थी कि दोनों सरकारी कर्मचारी थे, और बिना अनुमति के हेडक्वार्टर छोड़ कर नहीं जा सकते थे ।

पप्पा की छुट्टी का आवेदन देख कर ही उनके बॉस भड़क जाते थे, इसलिये ऑफिस में किसी को बताने का सवाल ही नहीं था। उन्होंने सोचा कि चुपचाप जा कर किसी को पता लगने से पहले वापस भी आ जाएंगे।

दोनों सरदार जी के ट्रक में बैठ कर ग्वालियर चल पड़े।

ट्रक तोतापुरी आमों से भरा था।

बाहर तेज बारिश हो रही थी। पप्पा ने सोचा इतनी दूर का सफर है तो आराम से बैठा जाए। उन्होंने पॅन्ट उतार कर पायजामा पहन लिया। पॅन्ट वहीं सीट के पीछे लटका दी और आराम से आलथी-पालथी मार कर बैठ गये। ड्रायवर और क्लीनर दोनों ही सरदार थे और बड़े अच्छे आदमी थे।
इधर उधर की बातें चल रहीं थीं। बारिश का ज़ोर बढ़ता जा रहा था।

आगरा मुंबई रोड होने की वजह से ट्रॅफिक भी अच्छा खासा था।

गुना से पहले रुकआई घाटी में पार्वती नदी पर एक पुल है । नदी भर कर रफ्तार से बह रही थी।

रात के करीब दो ढाई बजे थे।
सामने से रोडवेज की एक बस आ रही थी।

सरदार जी ने ट्रक एक साईड में ले कर रोक दिया। बोले

“बरसात की रात है, बस को आराम से निकल जाने दो, फिर हम जाएंगे।”

बस ने पुल पार किया और इन्होंने ट्रक आगे बढ़ाया।

अचानक जोर का आवाज आया और पुल बीच से टूट गया।

कुछ समझ में आने से पहले चारों ओर पानी ही पानी था।

पप्पा जाने कैसे ट्रक से बाहर निकले।

उन्हें तो तैरना भी नहीं आता। इधर-उधर जोर-जोर से हाथ पैर मारने लगे। कुछ देर बाद अचानक पैरों तले जमीन लगी।

जाने कैसे गले-गले तक पानी में खड़े हो गये।

ऊपर से बेतहाशा बारिश हो रही थी । नीचे नदी आनन-फानन बह रही थी।

पप्पा को कहीं से राजा...राजा... की आवाज सुनाई दी।

केतकर भी किसी तरह किनारे लग गये थे। दोनों बड़ी हिम्मत कर के धीरे-धीरे एक दूसरे की तरफ बढ़े और पास-पास पहुँच गये।

जब बहुत तेज़ बारिश होती है, तब एकदम घुप्प अंधेरा नहीं होता।

नदी के पानी पर गिरते बारिश के पानी की वजह से एक अजीब सी रोशनी थी। उसी रोशनी में उन्हें कुछ दूर नदी में पड़ा ट्रक दिखाई दिया।

ऐसा लगता था मानो दो पैरो पर खड़ा हो। उसके अगले पहिये पानी के बाहर थे । पिछला हिस्सा पूरी तरह पानी में डूबा हुआ था।

पप्पा और केतकर काका दोनों ने अपने जीवित होने पर भगवान के आभार माने।

फिर पप्पा बोले “यार केतकर, बड़ी गड़बड़ हो गई है। मैंने पॅन्ट उतार कर रखी थी । उसकी जेब में साढ़े आठ सौ रुपये थे।”

यह साढ़े आठ सौ रुपये उनकी कुल मिला कर सारी जमा पूंजी थे।

तब नूरमहल में रहते थे। कीमती सामान तो खास कुछ था नहीं, जो पैसे जमा होते उन्हें साथ ही जेब में ले कर घूमते थे।

उस जमाने में तो वह बड़ी भारी रकम थी।

तो पप्पा बोले  "मैं जल्दी से जा कर अपनी पॅन्ट निकाल लाता हूँ।"

केतकर ने पप्पा को कस कर पकड़ लिया। बोले जान बच गई, अब रुपये जाने दो।

इन दोनों की इधर बहस चल ही रही थी कि उधर देखते-देखते पूरा ट्रक ही पानी में चला गया।

कुछ देर सरदारों को ढूँढा । जब वे नहीं दिखे तो ये दोनों रास्ते पर निकल आए।

देखा पुल के दोनों ओर गाड़ियों की लम्बी कतारें लग गई थीं। रात के अंधेरे और बारिश की वजह से लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि हुआ क्या है?

वहाँ भी कुछ लोग पप्पा की पहचान के निकल आए।

इन लोगों की हालत खराब थी। बदन पर फटे भीगे कपड़े, पैरो में जूते नहीं ।

हर कोई जानना चाहता था कि हुआ क्या है।

किसी ने ले जा कर ढाबे पर चाय पिलाई और गुना ले जा कर छोड़ा।

वहाँ केतकर के कोई रिश्तेदार रहते थे। सुबह-सुबह चार बजे इन्हें ऐसी हालत में देख कर वे घबरा गये। सूखे कपड़े दे कर सोने की व्यवस्था की। जैसे तैसे घंटे दो घंटे सोए।

सुबह थोड़ी रोशनी आते ही बाहर निकल पड़े।

गुना के बाजार में बड़ी हलचल थी। चर्चा थी कि आगरा बॉम्बे रोड़ का पुल टूट गया है।

लोग गाड़ियाँ ले कर टूटा हुआ पुल और बाढ़ का पानी देखने जा रहे थे।

रात के अंधेरे में तो इन्हें भी ठीक से नहीं दिखा था कि क्या हुआ है, तो ये दोनों भी चल पड़े।

वहाँ पहुँच कर देखा कि तमाम भीड़ इकट्ठी है।

नदी के पानी में यहाँ से वहाँ तक आम बिखरे पड़े थे।

तमाशबीन बड़े शौक से आम उठा कर खा रहे थे, थैलियाँ भर रहे थे।

कई घंटों की तलाश के बाद पुलिस ने दोनों सरदारों के शवों को ढूँढ निकाला।

टूटे हुए पुल से बहुत दूर जा कर झाड़ियों में उनके मृत देह अटके हुए थे।

दोनों बेचारों के शरीरों की भयानक अवस्था थी। बदन पर कपड़े नहीं, बाल खुले हुए।

ट्रक कई किलोमीटर दूर जा कर मिट्टी में फँसा हुआ था।

पुलिस वालों ने यह भी पता लगा लिया था, कि ट्रक में दो व्यक्ति और थे।
उनके शवों की तलाश जारी थी।
पप्पा ओर केतकर बिना अनुमति के आए थे। उन्होंने सोचा कि यदि ऑफिस में पता चल गया तो नौकरी खतरे में पड़ जाएगी। इसलिये बिना कुछ बोले वहाँ से निकल कर ग्वालियर चले गये।

अगले दिन वापस भोपाल पहुँचे, तो काफी रात हो चुकी थी।

पप्पा ने केतकर से कहा कि इतनी रात को कहाँ घर जाओगे, आज मेरे साथ नूरमहल में ही रुक जाओ ,सुबह चले जाना।

दोनों मित्र नूरमहल पहुँचे।

अंदर लोग जाग रहे थे ,लेकिन बड़ी देर दरवाजा खटखटाने पर भी कोई दरवाजा ही खोलने को तैयार नहीं था।

बहुत आवाजें लगाने पर आखिर किशनदास बाहर आया। उसने काफी सवाल पूछ कर आखिर दरवाजा खोला।

इनके अंदर आने पर उसने पप्पा को हाथ लगा कर देखा और एकदम खुश हो गया।

बोला " अरे वाह बाबूजी, आप तो सचमुच जिंदा हो।"

कुछ लोगों का खयाल था कि ये तो मर गये, और असमय मौत के कारण उनका भूत भटकने लगा है, इसलिये वे दरवाजा नहीं खोलने दे रहे थे।

“ये खबर तुम्हें कहाँ लगी?” पप्पा ने पूछा।

किशनदास ने सुबह का अखबार उठा कर सामने रख दिया।

उसमें इनके अपघात की खबर छपी थी।

आगरा बॉम्बे रोड़ का पुल टूटना बड़ी घटना थी। अखबार तो अखबार रेडियो पर भी ये खबर बार-बार प्रसारित की जा रही थी। अखबार में लिखा था कि ट्रक में चार व्यक्ति सवार थे, जिनमें से दो के शव मिल गये हैं और दो शवों की तलाश जारी है।

इनके नाम तथा यह आरटीओ ऑफिस के कर्मचारी थे यह भी लिखा था।

सब लोग आकर आसपास बैठ गये। पप्पा जीवित को देख कर उन्हें दिल से खुशी हुई।

बोले “बाबूजी, हम लोग तो आपकी मौत की खबर सुन कर कल से दुखी थे। सोच रहे थे , बड़ा बुरा हुआ। बाबूजी बेचारे अच्छे आदमी थे। आपके दुख में कल से किसी ने शराब भी नहीं पी।”

उनकी आत्मीयता देख कर पप्पा बहुत प्रभावित हुए।

किशनदास बोला “सोच रहे थे आपके सामान का क्या करें? आपके घरवालों, रिश्तेदारों किसी के बारे में कुछ मालूम नहीं, बस इतना पता था कि आप ग्वालियर के हो, और आरटीओ में काम करते हो। सुबह वहीं से पता लगाने का विचार था।”

इस दौरान केतकर का एक भाई, जो किसी मंत्री के यहाँ काम करता था, वह भी गुना पहूँच गया था। वह बेचारा भी पुलिस के साथ दिन भर भाई के शव की तलाश में लगा रहा। जब कुछ नहीं मिला तो निराश होकर घर पहुँचा।

‘वसंता नदी में डूब कर मर गया’, यह खबर सुनते ही केतकर के पिता को दिल का दौरा पड़ गया था। वे बेचारे बहुत बीमार थे।

सुबह सुबह जब केतकर अपने घर पहुँचे, तो उन्हें देखकर भाई मारे खुशी के चिल्लाता हुआ पिता को बताने घर के अंदर भागा।

“वसंता आला..वसंता आला” उसने बाहर से ही चिल्लाना शुरू किया।

सुन कर पिताजी उठ बैठे।

जैसे ही उन्होंने वसंता को सामने देखा, उनकी दिल की धड़कन रुक गई।
उनका उसी क्षण देहांत हो गया।

अगले दिन पप्पा जब ऑफिस में पहुँचे, तो आरटीओ साहब ने बुलाया।

काफी नाराज थे। बोले तुम बिना एप्लिकेशन, परमीशन चले कैसे गये। कमिश्नर साहब बेहद नाराज हैं।

तब कर्णीकर भोपाल के कमिश्नर थे। उनका गुस्सा मशहूर था।

पप्पा को देखते ही भड़क गये। जोर-जोर से डाँटने लगे।

“तुम खुद को समझते क्या हो? सस्पेन्ड कर दूँगा।” वगैरह बोलते रहे।

काफी देर तक पप्पा ने सुन लिया। लेकिन २१-२२ साल की उम्र थी, और इस तरह किसी की डाँट सुनने की आदत भी नहीं थी।

बोले “बच गये हैं तो आपको यह सब सूझ रहा है, जो सचमुच मर ही गये होते तो क्या कर लेते?”

यह सुन कर वे बेचारे एक क्षण के लिये बिल्कुल चुप हो गये।

फिर बोले  “बकवास बंद करो। आइंदा ऐसा मत करना । अब भागो यहाँ से। जा कर अपना काम करो।”

इस हादसे का कुछ दिन कुछ असर रहा हो तो रहा हो, लेकिन पप्पा में कोई विशेष बदलाव नहीं हो सका।

                  बाकी अगली बार...

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