बाप रे बाप… १५

पप्पा हमेशा से ही अति उत्साही हैं। आलस का तो उनमें कहीं नामोंनिशान नहीं है।

हर समय कुछ ना कुछ करते ही रहते हैं।

यदि उन्हें किसी बात की सज़ा देनी हो, तो सबसे बढ़िया तरीका ये हो सकता है कि उन्हें घर में एक जगह बैठा कर रखा जाए।

हमारे घर पुणे आते, तो भी अकेले ही जाने कहाँ-कहाँ घूम आते।

एक वर्ष पुणे आए थे और अति वर्षा की वजह से उनकी ट्रेन कॅन्सिल हो गई थी। उसके बाद उन्हें तुरंत रेल का आरक्षण नहीं मिल पाया।

आई ना तो अनारक्षित जाने को तैयार थी, और ना ही बस से जाने को तैयार थी।

उस पर बारिश थी, कि रुकने का नाम नहीं ले रही थी। दिन भर घर में बैठ कर पप्पा की अवस्था पिंजरे में बंद जानवर की तरह हो गई थी। बेचैन से यहाँ से वहाँ चक्कर लगाते रहते।

एक दिन पंढरपुर की यात्रा में जाने वाले भक्त देखे, तो कहने लगे कि बस! अब बहुत हुआ। अब मैं भी इनकी तरह ही मंजीरे बजाता पैदल ही इंदौर निकल पड़ता हूँ। जब रिजर्वेशन मिले तब आई को ट्रेन में बैठा देना।

उनका कहना है कि जीवन में जो कुछ भी उन्होंने काम का सीखा है, वो सफर में ही सीखा है।

एक नशा सा है उन्हें सफर का।

और सफर भी कैसा? ये नहीं कि आराम से,ज़रा पहले से तय करके, ठीक से नियोजन कर निकलें। ऐसा कुछ तो उनके लिए लगभग नामुमकिन है।

उनका तो मन किया कि वे निकल पड़ते हैं।

हर बात यदि पहले से तय हो, तो उसमें मज़ा ही क्या है? मज़ा तो तब है जब अनपेक्षित, अचानक आन पड़ी विपत्ती या परिस्थिती से निबटने में आपका हौसला और दिमाग दाँव पर लगे।

वैसे उनकी इस जीवन गाथा में ये मैं कई बार कह चुकी हूँ कि वे बड़े असामान्य हैं।

उनके शौक भी उतने ही अजीबोगरीब हैं।

सत्रह-अठारह साल की उम्र में एक समय ऐसा था, जब उन्हें बिना टिकिट ट्रेन में सफर करने का बहुत शौक था।

“पर ऐसा करने की ज़रूरत क्या थी?” जब मैने पूछा, तो उन्होंने बड़ा दिलचस्प जवाब दिया था।

“पहले तो पैसे नहीं थे, इसलिए इस तरह सफर किया और बाद में इस बात का एहसास हुआ कि रोजमर्रा की ज़िंदगी में इंसान को आमतौर पर सबसे ज्यादा डर दो बातों का लगता है, एक तो मार खाने का और दूसरा बेइज्जत होने का। मार खाने से भी बदन पर चोट उतनी नहीं लगती जितना अपमान होता है। यदि इन दोनों डरों का सामना करना आने लगे, तो एक अजीब सा आत्मविश्वास आ जाता है।

"पर सीखोगे कैसे ये आप? तो उसके लिए ऐसी परिस्थिती में खुद जा कर घुसो और फिर निकलो। तब फायदा इतना तो रहता ही है कि आप फँस भी गये, तो अनुभव तो मिलता ही है, साथ ही बिना बहुत बड़े नुकसान के, बाहर निकलने का रास्ता आपको पता होता है।

और उसके लिए बिना टिकिट सफर करने से आसान तरीका कोई नहीं है।”

उनका कहना है, कि उस उम्र में उन्हें उसमें बड़ा रोमांच लगता था। हमेशा जेब में इतने पैसे रखते कि यदि पकड़े जाएँ, तो जुर्माना भर सकें।

जुर्माना टिकिट से अधिक ही होता। फिर भी सीधे-सीधे टिकिट खरीदने की बजाय उन्हें जुर्माना भरना मंज़ूर था।

उनका कहना है कि वह जो एक्साइटमेंट होता है, जो मानसिक किक मिलती है, उसकी तुलना किसी और चीज से हो ही नहीं सकती।

आपको पूरे समय एकदम सतर्क रहना पड़ता है । हर समय यह ध्यान रखना पड़ता है, कि टीसी कहाँ है।

आप देखते हो कि सामने से वो आ रहा है…

एक-एक टिकिट जाँचता हुआ आप की और बढ़ रहा है। यदि आप पकड़े गये तो इतने लोगों के सामने आप की बेइज्जती हो जाएगी।

जल्दी से जल्दी कोई तरकीब सोच कर आपको उससे पीछा छुड़ाना है ।

ज़रा गाफिल रहे कि गये काम से।

कभी आप ऐसे बचते हो कि उसे पता ही नहीं चलता । कभी उसे शक हो जाता है, और आप पूरी ट्रेन में भागते और छिपते हो । बार बार आपको आपका प्लान improvise करना पड़ता है। तुरत फुरत योजना बदलनी पड़ती है।

उस समय जो एड्रीनलीन रश होता है वह किसी फुटबॉल मॅच के क्लायमॅक्स सा होता है। जब आप बच कर प्लेटफॉर्म से बाहर निकलते हो तब जो विजयी एहसास होता है….

मतलब उस उम्र में होता था।

पप्पा जब सुस्त,आलसी, जवान लड़कों को देखते हैं ,जिन्हें बैठ कर कंप्यूटर पर उंगलियाँ चलाने के सिवाय और कुछ करने का मन नहीं करता, तो कहते हैं  

“इसे तो बिना टिकिट ट्रेन में चढ़ा दो तभी इसकी सुस्ती दूर होगी।”

उनके हिसाब से तो इस एक्सरसाइज को स्कूल कॉलेजों के अभ्यास क्रम मे एक विषय की तरह रखना चाहिए।

पप्पा ने अपनी जवानी में इतनी बार बिना टिकिट ट्रेन में सफर किया है कि उसकी कोई गिनती ही नहीं। शायद उस दौरान उन्होंने कभी टिकिट लिया ही नहीं।

तो कुछ हादसे होना तो स्वाभाविक ही है।

एक दफा पप्पा और उनके मित्र विठोबा बिना टिकिट सफर कर रहे थे। विठोबा को रेलवे में ही नई नई नौकरी लगी थी। टीसी के आने पर वे डर गये। उन्हें लगा कि पकड़े गये तो नौकरी ही जाएगी। उन्होंने चलती पंजाबमेल के एक डिब्बे के फुट बोर्ड से दूसरे डिब्बे के फुट बोर्ड पर छलांग लगा दी। उनके देखा देखी पप्पा भी कूद गये। टीसी से तो बच गये, लेकिन यह खयाल भी नहीं आया कि यदि छलांग लगाने में गलती हो जाती, या पाँव ही फिसल जाता तो जान से जाते।

                                 
एक बार डिसूजा नाम के मित्र के साथ सफर कर रहे थे। बिना टिकिट। एक टिकिटचेकर हो तो उसे सम्हालना आसान होता है ।लेकिन जब फ्लाइंग स्कॉड हो तो मामला अधिक चॅलेन्जिंग हो जाता है।

वे बिना टिकिट पकड़ कर सीधे जुर्माना नहीं करते। मजिस्ट्रेट के सामने ले जाते हैं। वहाँ से हवालात में जाने की संभावना भी होती है। काफी लफड़े वाली बात होती है। तो ज्यादा रोमांचक भी होती है।

उस दिन फ्लाइंग स्कॉड में सात आठ आदमी थे। पप्पा और डिसूजा उनसे बचने के लिये सारी ट्रेन भर भाग रहे थे। हर स्टेशन पर डिब्बा बदलते। उन्हें भी शक हो गया था और वे इन्हें पकड़ने की पूरी कोशिश कर रहे थे।

आखिर इटारसी के आस-पास जब ट्रेन पहुँची, तो इन्हें लगा कि अब तो जान बची। एक भी टीसी दिखाई नहीं दे रहा था। आराम से यहाँ वहाँ घूमने लगे। एक बोगी में कुछ लोग रमी खेल रहे थे। वहीं खड़े हो कर देखने लगे। शायद बीच-बीच में किसी को सलाहें भी दे देते। उनमें से एक ने पूछा "तुम्हारे भी पत्ते बाँटू क्या?"

पप्पा मजे में खेलने बैठ गये। डिसूजा पत्ते नहीं खेलते थे। वे बगल में बैठ कर खेल देखने लगे। फिर अचानक वे बेहद बेचैन हो गये। बार-बार कोहनी मारने लगे, इशारे करने लगे। आखिर पप्पा ने झुंझला के पूछा "क्या है?"

उन्होंने उपर इशारा कर दिया। कई काले कोट टंगे थे। पप्पा का मुँह खुला का खुला रह गया। वे सारे लोग जो रमी खेल रहे थे, वे वही टिकिट चेकर थे, जिन से बचने की कोशिश में ये घंटों लगे थे। डिसूजा के इशारे उन्होंने भी देख लिये थे। वे हँसने लगे। एक बोला “अच्छा तो वो तुम लोग ही थे।”

दूसरा बोला “चलो छोड़ो यार, अब जाने दो। तुम तो पत्ते बाँटो।”
                                           
एक बार कई दोस्त मिल कर दिल्ली गये। पप्पा जाते समय अकेले गये। बाकी सब पहले ही चले गये थे। एक मित्र को स्टेशन पर प्लेटफॉर्म टिकिट ले कर बुला लिया। वही दिखा कर बाहर निकले। लौटते समय बाकी सब ने टिकिट लिये लेकिन इन्होंने ठसके से कहा “मेरा टिकिट लेने की जरूरत नहीं।”

लोगों ने समझाना चाहा, लेकिन ये तो अपनी अकड़ में थे। टिकिट चेकर एक बूढ़ा खूसट सा आदमी था, जो  हर टिकिट बड़े गौर से जाँच रहा था। यदि कोई बिना टिकिट मिलता तो वह उससे हुज्जत या जुर्माना करने के बदले उसे एक कोने में खड़ा कर देता।

“बस सामने खड़े हो जाओ मैं तुमसे बाद में निबटूँगा।”

पप्पा के मित्र चिंतित हो गये।

गंधे कहने लगे “अब तुम क्या करोगे?”

भाटिया कहने लगे “सब की बेइज्जती करवाओगे। हमने तो पहले ही कहा था।”

टीसी एक-एक टिकिट पूरी तफसील से जाँचता हुआ उनकी ओर बढ़ रहा था। उसकी उम्र कुछ अधिक थी और शायद दिखता कम था । वह हर टिकिट खिड़की के पास ला कर बड़ी बारीकी से पूरा पढ़ता और तसल्ली होने पर ही अगले यात्री की और बढ़ता ।

पप्पा खिड़की के पास बैठे थे। टीसी उनकी सामने की बर्थ के यात्रियों के टिकिट जाँचता हुआ आगे बढ़ रहा था। पप्पा को बचने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था।

यदि वह सीधे-सीधे जुर्माना करता तो जरा शान कम होती लेकिन चल जाता। लेकिन वह जो कोने में खड़ा कर रहा था वह काफी अपमानजनक था। उस घड़ी मित्रों के सामने नाक कट जाएगी इसकी चिंता अधिक थी।

पप्पा ने मन ही मन भगवान से प्रार्थना भी कर डाली कि ट्रेन का ऍक्सिडेंट हो जाए। लेकिन ऐसा कुछ होने के लक्षण नहीं दिख रहे थे।

सामने की बर्थ पर एक आदमी गहरी नींद में सो रहा था। टीसी ने उसे हिला-हिला कर जगाया और टिकिट मांगा। उसने नींद में ही टिकिट आगे बढ़ा दिया। टीसी खिड़की के पास ला कर उसका टिकिट जाँचने लगा। अचानक पप्पा की नजर भी टिकिट पर पड़ गई। उस पर लिखा था 'आगरा कॅन्ट'

तसल्ली होने पर उसने टिकिट वापिस किया। सामने की बर्थ के छ: आदमियों के टिकिट जाँचने के बाद पप्पा की बर्थ की ओर बढ़ा। किस्मत से उसने दूसरी ओर से शुरूवात की। कोने में बैठे आदमी का टिकिट ले कर वह उस तरफ की खिड़की के पास गया।

अचानक पप्पा के दिमाग में एक विचार बिजली की तरह कौंधा । उन्होंने ऊपर सोए आदमी को हिला कर धीरे से कहा आगरा कॅन्ट आ गया। वह हड़बड़ा कर नीचे कूदा। पप्पा किसी बंदर कि चपलता से उसकी जगह पर पहुँच गये। वह पप्पा  की जगह पर आ कर बैठ गया। टीसी एक-एक टिकिट जाँचता आखिर तक पहुँचा और उसने फिर उसी आदमी से टिकिट मांगा। वह भड़क गया ।कितनी बार टिकिट मांगोगे । टीसी भी चिढ़ गया ,बोला जितनी बार मांगूँगा उतनी बार दिखाना पड़ेगा। दिखाओ वरना वहाँ जा कर खड़े हो जाओ। भुनभुनाते हुए उसने फिर टिकिट दिखाया। टीसी आगे बढ़ गया।

कुछ देर बाद मथुरा आया तो वह आदमी पप्पा पर बेहद चिढ़ गया। बोला “तुम्हें सोना था तब भी ये कोई तरीका नहीं था मुझे उठाने का।”
                                        
बहुत सालों बाद, जब पप्पा दुनियादारी की झंझटों में फँस चुके थे और बिना टिकिट सफर का रोमांच खत्म हो चुका था ,तब की बात है।

पप्पा उनके दो क्लाइंट्स ,मोहन बाबू और विरेन्द्र के साथ किसी केस के सिलसिले में ग्वालियर जा रहे थे। मोहन बाबू टिकिट ले कर स्टेशन पर ही मिले। हालांकि उन्होंने निकाले तो तीन टिकिट थे ,लेकिन गड़बड़ी में विरेन्द्र का टिकिट कहीं गिर गया। इस बात का पता ट्रेन शुरू होने पर लगा। 
पप्पा और मोहन बाबू दोनों को ही कोई विशेष चिंता नहीं हुई। दोनों तान के सो गये। लेकिन विरेन्द्र बेचारे पूरी रात जागते बैठे रहे। किस्मत से उस रोज कोई टीसी आया ही नहीं।

स्टेशन से बाहर निकलने तक बेचारे परेशान रहे। बाहर पहुँचने पर उन्होंने चैन की साँस ली।
बोले “ये मेरी जिंदगी का बिना टिकिट सफर करने का दूसरा मौका है।

पहला अनुभव भयानक था।

पहली बार भी बिना टिकिट सफर करने का कोई इरादा नहीं था ,लेकिन ट्रेन छूट रही थी, इसलिये चढ़ गया ,सोचा टीसी से बात कर के टिकिट बनवा लूँगा। लेकिन बदकिस्मती से उस दिन फ्लाइंग स्कॉड आ गये। 
वे मेरी बात सुनने को तैयार ही नहीं थे। 
किसी साधारण चोर उचक्के की तरह पकड़ कर मुझे प्लेटफॉर्म पर ले आये। मैं एक पढ़ा लिखा, शरीफ खानदान का लड़का, मेरे पिताजी सुप्रिटेंडंट ऑफ पुलिस । कोई पहचान लेगा तो क्या होगा ये सोच कर ही मेरी हालत खराब हो गई।

उतने में स्टेशन पर खड़े एक कॉन्स्टेबल ने पहचान ही लिया।

“अरे भैया जी आप यहाँ कैसे?”

उसने बड़े उत्साह से आ कर पूछा। मुझे इतनी शर्म आई कि क्या बताऊँ। उसे सारा मामला बताया और कहा कि तुम ही कोई रास्ता निकालो।

वह कहने लगा “अब तो कोई रास्ता नहीं है। वे आपको मजिस्ट्रेट के पास ले जाएंगे। वो टीसी की बात सुनेगा और फिर आपको या तो हवालात भेज देगा या फिर जुर्माना करेगा। लेकिन यदि आप मानो तो बस एक ही उपाय है बचने का।”

“आप भागो। कुछ देर मैं आपके पीछे भागूँगा, फिर लौट कर कह दूँगा कि वह तो भाग गया।”

“उस समय मुझे वही उपाय सबसे बेहतर लगा। और आप सोचो कि मैं इतना पढ़ा लिखा, SP का बेटा प्लेटफॉर्म पर दौड़ रहा था, और मेरे पीछे एक कॉन्स्टेबल दौड़ रहा था। मैं बाहर निकल गया और वो वापस लौट गया। 
लेकिन आज के बाद कभी गलती से भी ऐसे सफर नहीं करूँगा। यह तनाव मुझसे नहीं सहन होता।”

पप्पा को सुन कर शायद अफसोस ही हुआ होगा।

पप्पा के साथ ट्रेन का सफर करने में जितना मजा आता हैं, उतना ही सरदर्द भी होता है। वे बेहद अस्वस्थ आत्मा हैं। 
यदि ट्रेन दस सेकंड के लिये भी किसी प्लेटफॉर्म पर रुके तो भी वह नीचे उतरते हैं ।
सिगनल हरा होने तक बिना वजह इधर उधर टहलते रहते हैं। जब ट्रेन चलना शुरू कर देती है, तब वे दौड़ लगा कर ट्रेन में छलांग लगाते हैं।
इस सारे कार्यक्रम में उम्र उनके आड़ नहीं आती।

जब बगैर टिकिट सफर करते थे ,तब तो ट्रेन प्लेटफॉर्म पर पहुँचने से पहले ही आउटर पर, चलती ट्रेन से कूद जाते थे। 
रिक्शा स्टॅन्ड पर खड़े हमेशा के रिक्शावाले भी अक्सर पूछा करते ,कि आप इधर किधर से आते हो?

एक बार जब हम तीनों बहुत छोटे थे , उनके साथ ग्वालियर जा रहे थे। आई बाद में आने वाली थी।

पप्पा आदतन बीच में किसी स्टेशन पर उतरे और गाड़ी चल पड़ी।

वो आए ही नहीं।

हम लोग बहुत छोटे थे। काफी डर गये थे। सुबोध तो शायद पाँच साल का था। वह पप्पा की चिंता में दरवाजे की तरफ दौड़ा। लोगों ने पकड़ लिया वरना कूद ही जाता। बोगी में बहुत से आर्मी वाले थे। वे हमारा दिल बहलाने के लिये हमारे साथ खेलने लगे।

पप्पा गार्ड के डिब्बे में चढ़ गये थे। फिर वहीं किसी से गप्पें मारने लगे। उनके मन में यह विचार ही नहीं आया, कि हम लोग परेशान होंगे।

उनके हिसाब से तो वह ट्रेन में ही थे।

अगले स्टेशन पर जब वह वापस आए तो हमारे साथ-साथ हमारे सहप्रवासियों की भी जान में जान आई।

हमारे रिश्तेदार भारत भर बिखरे पड़े थे । हम लोग अक्सर ट्रेन में सफर करते।

आई और पप्पा दोनों ही ग्वालियर के होने की वजह से वहाँ साल में कम से कम एक बार तो ज़रूर जाते।

एक बार रात का सफर था। ऊपर की बर्थ पर सोया एक आदमी इतनी जोर से खर्राटे भर रहा था कि ऐसा लग रहा था, मानो बिना सायलेंसर की मोटरसायकल हो।

सब लोग बेहद परेशान थे।

पप्पा ने आई से एक सेफ्टी पिन माँगी। पिन से उस आदमी के सिरहाने रखे हवा भरे तकिये में एक छेद कर दिया। कुछ ही देर में उसके तकिये की सारी हवा निकल गई । वह उठ कर बैठ गया और फिर हवा भरने लगा।

पप्पा बोले अब तुम लोग आराम से सो जाओ ये तो रात भर तकिये में हवा भरता रहेगा। और सचमुच वैसा ही हुआ।

पप्पा को ट्रेन का सफर बेहद पसंद है। उन्हें हमेशा सेकन्ड क्लास से सफर करना अच्छा लगता है।

आजकल ट्रेनों की हालत इतनी खराब होती है, और वहीं दूसरी ओर हमारी हालत अच्छी है तो हम सेकन्ड क्लास में सफर करना टालते हैं।

लेकिन पप्पा को तो AC से ही सख़्त नफरत है। उन्हें आर्टिफीशियल हवा ही अच्छी नहीं लगती।

कभी हम उनका टिकिट निकालें तो वो जिद करते हैं, कि तुम लोग AC में बैठो मैं तो सेकन्ड क्लास में ही बैठूँगा। बीच-बीच में हर स्टेशन पर तुमसे मिलने आता रहूँगा।

फिर वह बड़ा रसीला वर्णन कर के बताते हैं कि खुली खिड़की से क्या बढ़िया हवा आती है। बारिश के मौसम में जो फुहार आती है, उसकी तो बात ही कुछ और है। मज़े में खेत-खलिहान ,नदी-पहाड़ देखते हुए सफर करो। उसी में मजा है। यहाँ से वहाँ पहुँचना ही तो सफर का मकसद नहीं है। वगैरह-वगैरह..

उनके इस भाषण से ना हम पहले प्रभावित होते थे, ना अब होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले हमें उनकी बात मानना पड़ती थी, अब नहीं मानते। वो तो ना तब किसी की मानते थे ना अब मानते हैं। 

हवाई सफर तो उन्हें सख्त नापसंद है। उन्हें वो फिजूलखर्ची लगती है। उनके मुताबिक तो दुनिया में बहुत कम लोग ऐसे हैं, जिनको समय बचाने की इतनी जरूरत है। कहीं पहुँच कर उन्हें इतनी खुशी नहीं मिलती जितनी सफर में मिलती है। 
वे आस पास बैठे हर व्यक्ति से बात करते हैं। इसलिये वे इतने अधिक लोगों को जानते हैं। हर जगह उन्हें कोई ना कोई पहचान का मिल ही जाता है । ना हो, तो वे पहचान बना लेते हैं।

एक बार मुंबई जा रहे थे। समाने एक १५-१६ साल का डरा हुआ लड़का बैठा था। बिना टिकिट था। 
पप्पा ने उससे बातचीत शुरू की। पता चला पिता की डाँट से नाराज हो कर घर से भाग आया था। ट्रेन में बैठते तक तो गुस्सा था, लेकिन फिर डर के मारे बुरी हालत थी। 
पप्पा उसे ले कर अगले स्टेशन पर उतरे। उसे समझा बुझा कर स्टेशन मास्टर के पास ले गये। उसके रिटर्न टिकिट के पैसे दे कर उन पर ये जिम्मेदारी सौंपी कि उसे लौटती ट्रेन में बैठाएँ।

पप्पा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्हें सिर्फ सफर करना पसंद है। लेकिन उन्हें घूमने का ज़रा भी शौक नहीं है। कहीं भी जाएँ उन्हें घर आने की जल्दी रहती है।

ट्रेन से नदी-पहाड़ देखना उन्हें अच्छा लगता है , लेकिन पहाड़ों पर पहुँच कर वे बेचैन हो जाते हैं।

बचपन में हर साल शिवरात्री के दिन हम लोग भोजपुर के पुराने शिव मंदिर जाते। साथ खाने का डिब्बा ले जाते।

लेकिन वहाँ पहुँचते ही पप्पा वापस घर जाने की इतनी जल्दी मचाते कि सबका मजा खराब कर देते। 
डेढ़ दो घंटे सफर कर हम वहाँ पहुँचते । 
पहुँचते ही पप्पा को चिंता होने लगती कि वापसी की बस में भीड़ हो जाएगी। या बस निकल ही जाएगी। 
एक बार तो उनकी इस जल्दबाजी की वजह से आई इतना चिढ़ गई कि साथ लाया डिब्बा बिना खोले ही हम घर आ गये, और फिर घर आ कर उस डिब्बे का खाना खाया।

मुकदमों के सिलसिलों में उन्हें अक्सर बाहर जाना पड़ता। चाहे कहीं भी जाएँ उनकी यह कोशिश होती कि रात को घर लौट आएँ। कभी-कभी तो काम पूरा नहीं होता तो वे जबलपुर या इंदौर से भी वापस आ जाते और अगले दिन फिर चले जाते।

एक बार शायद ग्वालियर या जबलपुर गये थे। तब उनकी उम्र करीब ६५-६८ के आस पास रही होगी। तेज बरसात हो रही थी। ट्रेन छूटने वाली थी इसलिये दौड़ते हुए प्लेटफॉर्म पर पहुँचे (टिकिट ले कर) और ट्रेन चल पड़ी। 
उन्होंने दौड़ कर एक हाथ से दरवाजे का हॅन्डल पकड़ लिया। दूसरे हाथ में बॅग थी। हँडल गीला होने की वजह से हाथ फिसल गया और पप्पा नीचे सरक गये। ट्रेन चल रही थी। पप्पा ने हाथ छोड़ा नहीं वरना पहिये के नीचे आ जाते। ट्रेन के नीचे लटके प्लेटफॉर्म की दीवार से टकराते रहे। किसी  ने चेन खींची और प्लेटफॉर्म से बाहर जा कर ट्रेन रुकी। लोगों ने उन्हें ऊपर खींचा। कुछ ने नाराजगी दिखाई कि इस उम्र में ऐसे स्टंट करने की हिम्मत कैसे होती है?

पप्पा काफी काले नीले हो गये थे ,लेकिन भयानक चोट कोई नहीं थी।

भोपाल पहुँचे तो आई सो चुकी थी । उन्होंने जगाना ठीक नहीं समझा । खाना खा कर और एक कॉम्बीफ्लॉम की गोली खा कर सो गये। सुबह उनकी हालत देख कर आई बेहद घबरा गई थी।

उसके बाद लेकिन आई ने पप्पा पर कई पाबंदियाँ लगा दीं।

लेकिन मान जाएँ तो वो पप्पा ही क्या?

                                  बाकी अगली बार....

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