बाप रे बाप… १२

भोपाल में पप्पा को सरकारी क्वार्टर मिल गया था। रहने वाले अकेले। फिर क्या था, दोस्तों को इससे बेहतर जगह कहाँ मिलती? 
जिस किसी को भोपाल आना होता,या जिस किसी को भोपाल में नौकरी मिलती,अपना बोरिया-बिस्तर ले कर ग्वालियर से सीधे पप्पा के घर आ धमकता। पूछने वूछने का तकल्लुफ करने की ना तो कोई ज़रूरत थी, और ना ही इतने औपचारिक उनके सम्बंध थे। पप्पा हर एक का खुले दिल से स्वागत करते। घर उनका था, इसलिये किसी से खर्चा वगैरह माँगने का तो उनके मन में कभी विचार आना भी संभव नहीं था।

धीरे-धीरे उस क्वार्टर में रहने वालों की संख्या बढ़ने लगी। सुरेन्द्र साठे, नारायण बाबर और दामू तो थे ही,निर्वीकर भी आ गये।

सुरेन्द्र साठे पप्पा की मौसी के लड़के थे । साठे काका को खाना बनाना अच्छा नहीं लगता था । नारायण रोटियाँ बनाते और उन्हें हमेशा ये शिकायत रहती कि सुरेन्द्र बहुत रोटियाँ खाता है।
साठे काका की खुराक जरा अच्छी थी, और उन्हें उस पर नारायण की टीका टिप्पणी बिल्कुल अच्छी ना लगती। वे सब के साथ खाना खाने नहीं बैठते। 
कहते तुम सब खा लो मैं सबसे बाद में खाऊँगा। बाद में जितना भी खाना बचता, वे सब का सब खत्म कर जाते और उसके बाद सारे बर्तन भी वही माँजते और बाद में किचन की साफ सफाई करते।
एक बार पप्पा ऑफिस से घर लौटे तो निर्विकर गुस्से में लाल पीले हो रहे थे।
बोले " मुझे तो अब इस घर में रहना मुश्किल है। साठे हर समय सिगरेट पीता रहता है। मुझे धुएँ से बहुत तकलीफ होती है। मैं अब बर्दाश्त नहीं कर सकता । तुम उसको बोलो कि या तो वो ये गंदी आदत छोड़े, या कहीं और ठिकाना ढूँढ ले, वरना मैं तो यहाँ नहीं रहूँगा।"

पप्पा ने कहा कि घर छोड़ने को तो मैं नहीं कहूँगा, लेकिन मैं उससे बात कर के देखता हूँ।

पप्पा ने साठे काका से कहा कि तुम्हारे सिगरेट पीने पर बाल को सख्त एतराज है।

उस पर साठे काका बोले " ये खुद हर समय तंबाकू खाता है ,और तो और उस पर घर में बैठ कर जूँआ भी खेलता है। मुझे भी यह सब सहन नहीं होता । तुम उससे कहो पहले अपनी आदतें सुधारे।"

"हम सब ब्राह्मण लोग हैं । ये नारायण मराठा है। घर में नॉनवेज बनाता है। कितना बुरा लगता है। उसे भी सुधारो।"

नारायण कहने लगे "दामू जो पूरा समय दारू पी कर धुत रहता है, वो क्या सहन करने लायक है?"

सब एक दूसरे के पीछे पड़ गये। पप्पा को लेकिन किसी से कोई आपत्ति नहीं थी।

उन्हें इन सब की तरह किसी प्रकार की लत भी नहीं थी, लेकिन किसी बात से एतराज भी नहीं था। यदि को सामने कर देता तो सिगरेट ,शराब पी लेते, रमी खेलने में तो वो उस्ताद थे, और पका पकाया मुर्गा मिल जाता, तो वह भी बड़े शौक से खा लेते। वो तो नसवार सूँघना भी सीख गये थे। उनका तो हमेशा का सिद्धांत था कि, शौक हर चीज का कर लो, लेकिन आदत किसी बात की नहीं होनी चाहिए।

उन्होंने आखिर बाल काका से कहा

“देखो भाई , मैं तो किसी से नहीं कह सकता जाने को।

मुझे तो किसी से कोई परेशानी नहीं है। यदि तुम्हें हो तो अब तुम ही सोचो। देखो कहीं दूसरा इंतजाम हो जाए तो।”

बाल काका तन-तनाते हुए चले गये।

दुसरे दिन पप्पा जब ऑफिस से लौटे तो देखा सब के सब मजे में थे। पिछले दिन के झगड़े का कोई धुँधला सा निशान भी बाकी नहीं था।

जब तक उनकी शादियाँ नहीं हुईं, कोई भी घर छोड़ कर नहीं गया।

उन सब के मुताबिक "क्या बढ़िया दिन थे वो।"

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नाना को अपने मित्र पर बड़ा गुस्सा आया हुआ था।

वे उसे दिखाना चाहते थे कि वे जब चाहें उन्हें सरकारी नौकरी मिल सकती है।
उन्होंने नौकरी के लिये आवेदन किया। जवाब आया कि अभी हमें आपकी सेवाओं की आवश्यकता नहीं है।

पप्पा भोपाल में नौकरी कर ही रहे थे। नाना ने उनसे कहा कि वे रानी पद्मावती देवी,जो उस समय  राज्य आरोग्य मंत्री थीं ,उनसे मिलना चाहते हैं।

पप्पा तो हमेशा से ही बेहद साधन सम्पन्न (resourceful) रहे हैं।  उनका परिचय शंकरदयाल शर्मा जी के भांजे से हो गया था। उनकी मदद से पप्पा ने रानी पद्मावती देवी की अपॉइन्टमेंट ली।

नाना के साथ उनसे मिलने पहुँचे।

नाना ने उन्हें बताया
“मैंने सरकारी नौकरी के लिये आवेदन दिया था, लेकिन वहाँ से मुझे जवाब आया है कि आपकी सेवाओं की अभी भारत सरकार को जरूरत नहीं है।”
“तो उन्हें जरूरत नहीं होगी । इसमें मैं क्या कर सकती हूँ।” वे बोलीं।

नाना ने अखबार का एक पन्ना निकाला।

उसमें उस समय के केन्द्रीय आरोग्य मंत्री का संसद में दिया हुआ बयान छपा था।
नाना ने उस में से पढ़ कर बताया कि केंद्रीय आरोग्य मंत्री ने कहा है कि देश को तुरंत चालीस हज़ार डॉक्टरों की आवश्यकता है।

"अब या तो आरोग्य मंत्री झूठ बोल रहे हैं या फिर आरोग्य मंत्रालय झूठ बोल रहा है। दोनों बातें तो हो नहीं सकती ना"

वे बेचारी परेशान हो गईं। बोली आप जाइए। मैं देखती हूँ क्या समस्या है।"
कुछ ही दिनों बाद उन्हें घर पर सिविल सर्जन पद का नियुक्ति पत्र मिला।
लेकिन उनकी नियुक्ति ग्वालियर से बहुत दूर राजस्थान सीमा पर किसी छोटे से कस्बे में हुई थी।
नाना फिर पप्पा को लेकर रानी पद्मावती के पास पहुँचे।
“जब आपको मेरा काम करना ही नहीं था ,तब साफ ही कह देना ठीक होता। इस तरह एक तरफ तो आपने नौकरी दिलवा भी दी, और दूसरी तरफ यह भी बंदोबदस्त कर दिया कि मैं वहाँ ना जाऊँ। अपना घर बार छोड़ कर इतनी दूर मैं क्यों जाऊँगा।”

वे फिर सोच में पड़ गईं।

पर उन्होने फिर तुरंत ही नाना का तबादला ग्वालियर के बिल्कुल पास के किसी गाँव में कर दिया।

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पप्पा की मित्र मंडली भी दुनिया से निराली थी।  उनमें से हर एक अपनी मिसाल आप ही था।

दामू काका का उनमें विशेष स्थान था। वे आमतौर पर नशे में बिल्कुल धुत रहते। PWD में इंजीनियर थे। जब भी कभी भोपाल में होते तो सुबह से हमारे घर आ जाते। 
उन्हें देख कर ही आई का दिमाग खराब हो जाता। यदि पप्पा घर पर नहीं होते तो आई सीधे बाहर ही उनके लिये कुर्सी भिजवा देती। चुपचाप आँखें बंद किये बाहर बैठे रहते। 
पप्पा होते ,तो फर्क सिर्फ इतना होता कि वो चुपचाप अंदर आँख बंद किये पप्पा के सामने बैठे रहते। पप्पा अपना काम करते रहते। उनको आपस में बात करने की कोई ज़रूरत नहीं होती। कभी-कभी पप्पा का कोई क्लाईंट होता, तो भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। सब को उनकी आदत थी।

कभी-कभार ऐसा भी होता कि वे नशे में नहीं होते। साफ सुथरे ,दाढ़ी बनाए, नहाए धोए होते। तब वो चाय भी पीते और सबसे बातें भी करते।

महीने के किसी-किसी रविवार को हमारा रद्दी बेचने का कार्यक्रम होता। जब रद्दी वाला हमारे घर की रद्दी तौल रहा होता, तब मैं उसकी रद्दी तलाशती। मुझे हमेशा उसकी रद्दी के ढेर में कोई ना कोई बेहद मनोरंजक या रोचक किताब मिल जाती। फिर हम अपनी रद्दी बेच कर दूसरों ने बेची हुई रद्दी खरीद लेते।

एक रविवार को सुबह-सुबह दामू काका पूरे होशो-हवास में हमारे घर आए।

उस दिन वे भी मेरे साथ रद्दी का ढेर टटोलने लगे। अचानक उन्हें उस ढेर में एक आयुर्वेदिक वनौषधी की पुरानी किताब मिल गई। उन्हें वह बेहद रोचक लगी।

जब हमने उस किताब में कोई रुचि नहीं दिखाई तो उन्होंने वो किताब खुद ही खरीद ली। उसके बाद तो वो किताब पढ़ना और उसमें लिखी जड़ी बूटियाँ और पेड़-पत्ते तलाश करना,पहचानना यही उनका शौक बन गया।

उनकी नियुक्ति अमरकंटक में हो गई और वे वहाँ भी अपनी किताब ले गये। जब छुट्टी पर वापस आए तो बहुत खुश थे।

उस किताब में लिखी हुई बहुत सी जड़ी बूटियाँ उन्होंने अमरकंटक के जंगलों में ढूँढ निकाली थीं ,और किताब में पढ़-पढ़ कर ही कोई भस्म तैयार की थी। उनके अनुसार वह भस्म हर मर्ज की दवा थी।

अमरकंटक में जहाँ वह रहते थे, वह आदिवासी इलाका था । दामूकाका ने वहीं अपनी मेडिकल प्रॅक्टिस शुरू कर दी।

कोई आदिवासी चाहे किसी भी बीमारी से ग्रस्त हो ,दामू काका उसे उसी भस्म की पुड़िया बना कर दे देते।

दाँत का दर्द, जुलाब,बुखार,ज़ख्म .. हर बात का इलाज बस वही पुड़िया।

दामूकाका का कहना था कि उनकी पुड़िया खा कर लोग फटाफट ठीक ही हो जाते।

उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी, और उनके पास मरीज़ों की कतार लगी रहती थी।

दामू काका की फीस भी सब के लिये समान थी।

चाहे जो भी बीमारी हो, यदि मरीज ठीक हो जाता तो वह उससे एक देशी दारू की बाटली और एक मुर्गा लेते ।

अमरकंटक में कड़कनाथ नामक देशी काले मुर्गे मिलते थे ,जो बकौल दामू काका ब्रॉयलर से बहुत ज्यादा स्वादिष्ट होते ।

एक बार तो एक औरत का प्रसूति के समय बच्चा अड़ गया था। लगता था उसकी और बच्चे की दोनों की जान जाएगी। दाई कुछ कर नहीं पा रही थी।

उसका पति दौड़ा-भागा दामू काका के पास आया।

यहाँ एक पुड़िया भस्म उस औरत के मुहँ से अंदर गई, और वहाँ फट से बच्चा बाहर आ गया।

ये कहानी सुन कर हम तो हँस-हँस कर लोट-पोट हो गये थे।

पप्पा को ये किस्सा इतना पसंद आया, कि उन्होंने कई बार दामू काका से फिर-फिर सुना, और दूसरों को भी सुनाया।

एक बार वे बेहद पिये हुए थे। जब वापस जाने लगे तो उन्हें हमारे आँगन का फाटक खोलते ही ना बने। उनके हाथ कहीं के कहीं जा रहे थे।

इसी उलझन में उनके हाथ की छोटी उँगली फाटक की जाली में अटक गई। उन्होंने ज़ोर का झटका दे कर निकालना चाहा तो पूरी उँगली ही कट कर अलग हो गई।

दामू काका को पता ही नहीं चला।

जब बड़ी देर तक उन्हें फाटक के पास लड़खड़ाते देखा तो पप्पा उनकी मदद करने गये।

वहाँ जा कर देखते हैं कि खून बह रहा है, कटी हुई उँगली जमीन पर पड़ी थी। दामू काका तो पूरी तरह धुत थे, उन्हें इससे कोई मतलब नहीं था । वे तो दरवाजा खोलने की कोशिश में लगे थे।

फिर पप्पा की ही ज़बानी " तो फिर मैंने वो उँगली उठा कर मूंगफली की तरह कागज की पुड़िया में बांधी और दामू को एक पट्टी बांधी। फिर दामू और उँगली दोनों को लेकर हमीदिया अस्पताल पहुँचा। वहाँ डॉक्टर से पूछा कि ये उँगली जुड़ सकती है क्या? अच्छी कंडीशन में थी।

“वे बोले कोशिश करते हैं। मैंने कहा इसे एनेस्थीजिया वेनेस्थीजिया की कोई जरूरत नहीं है, आप तो वैसे ही सिल दो। दामू की हालत देख कर डॉक्टर को मेरी बात पर कोई शक नहीं हुआ। और वाकई दामू को भी कुछ पता नहीं चला। दूसरे दिन जब होश आया, तो खुद को अस्पताल में पा कर भौचक्का रह गया।"

तो इस तरह की छोटी मोटी घटनाएँ उनके जीवन में होती रहती थीं। इससे उनके पीने पर कोई परिणाम न होता। उनके लिव्हर सिरोसिस की तो उनके समेत किसी को भी चिंता नहीं थी।

एक बार पप्पा और दामू काका किसी मित्र के पिता का अंतिम संस्कार करने शमशान घाट गये थे।

पप्पा ने पूछा "दामू , यार तुम्हारी हालत देख कर लगता है कि तुम्हें भी जल्दी ही यहाँ पहुँचाना पड़ेगा । कोई अंतिम इच्छा हो तो अभी ही बता दो"

फिर दामू काका पप्पा को ले कर एक देशी दारू की दुकान के पास गये। बाहर कुछ भिखारी बैठे थे।

"इन सब को एक एक अध्धा और उसके साथ सामने की भजिये की दुकान से भजिये की एक पुड़िया बस इतना खरीद देना । मेरी आत्मा को शांति निश्चित रूप से मिल जाएगी ।" दामू काका बोले।

उनकी हालत बद से बदतर होती गई। एकदम दुबले पतले हड्डी का ढाँचा, पीली आँखें और काला रंग। उनकी तरफ देखना भी बुरा लगता था। नौकरी पर जाना भी मुश्किल हो चला था। भाई के घर रहते। वहाँ कोई कुछ बोलता तो हमारे घर आ कर बैठ जाते। कभी -कभी कई दिनों तक ना जाने कहाँ गायब हो जाते।

मनीषा तब मेडिकल कॉलेज में पढती थी। एक दिन हमीदिया अस्पताल के बरामदे से चली जा रही थी। सामने से स्ट्रेचर पर एक पेशंट को ले जाया जा रहा था। पेशंट उसे देख कर एकदम उठ कर बैठ गया। “मनीषा..मनीषा…”

दामू काका थे। बुरी हालत में थे। बोले “मेरे पास दवाई तक के पैसे नहीं हैं । तेरे पास कुछ पैसे हों तो दे दे।”

मनीषा के पास कुछ पचास- साठ रुपये थे, जो उसने दे दिये। उन्हें एडमिट वगैरह करवा के वो अपने काम पर चली गई।

उस रात दामू काका हॉस्पिटल से गायब हो गये। अगले दिन पूरी तरह नशे में धुत फिर अस्पताल में भरती कराए गए। लेकिन यह अंतिम बार ही था । उसके बाद तो उन्हें दुनिया से ही डिस्चार्ज मिल गया ।

पप्पा ने उनके कहे अनुसार उनकी अंतिम इच्छा पूरी की।

                           बाकी अगली बार....

2 thoughts on “बाप रे बाप… १२

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  1. Swati …पूरी picture आँखों के सामने खुलती जाती है। यही तेरे लिखने की ताक़त है। keep it up !

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