बाप रे बाप …१०

स्टेशन से पप्पा सीधे पुराने भोपाल में देवास मोटर्स के गॅरेज नूरमहल पहुँच गये।

बड़ा सा आहाता था,जिसमें ढेरों लोग रहते थे।

गॅरेज का एकमात्र कमरा उन्हें दे दिया गया। जहाँ उन्होंने अपना सामान यानि एक गद्दा, स्टोव्ह और बॅग जमा लिये।

नूरमहल के निवासियों में पप्पा सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे, होशियार और सुसंस्कृत तो थे ही, दिखने में भी किसी हीरो से कम नहीं थे, बात करने में तो उनका जवाब ही नहीं था।

तो ज़ाहिर है कि तुरंत ही वे सब के नेता बन गये।

उनका काम करने के लिये सब लोग उत्सुक रहते। खाना बनाने, बर्तन माँजने और कपड़े धोने जैसे काम कब हो जाते उन्हें पता तक नहीं चलता।

जब वे शाम को बाहर एक चारपाई पर बैठ कर चाय पीते, तो बाकी जनता नीचे बैठती। यदि पप्पा ने कोई चीज लाने को कहा और अगर वह चीज चार मील दूर से लानी होती, तो भी लोग खुशी-खुशी दौड़ पड़ते।

पप्पा जैसा पढ़ा लिखा,जो खुद का अखबार खरीद कर पढ़ता है, उस पर RTO ऑफिस में काम करने वाला व्यक्ति उनके साथ नूरमहल में रहता है, इस बात का उन्हें बेहद गर्व महसूस होता।

वे लोग  पप्पा की बहुत इज्जत तो करते ही थे ,लेकिन उन्हें अपना भी समझने लगे थे।

वे पप्पा को बाबूजी कह कर पुकारते।

किशन दास उनमें से एक था। उम्र में पप्पा से लगभग २०-२५ साल बड़ा था, लेकिन उनका सबसे बड़ा फॅन था ।

उससे तब पहली बार पहचान भोपाल स्टेशन हुई थी, लेकिन जब तक वह जीवित रहा, बड़े प्यार से हमारे घर आता रहा।

एक बार पप्पा को देवास मोटर्स के ड्रायवर ,कंडक्टर बस स्टॅन्ड पर दिखे।
आराम से खड़े मूंगफली खा रहे थे।

पप्पा को देखा तो हँसने लगे। बोले

“ बाबूजी, ये मूंगफली तो हम लोगों को दिखाने के लिये रखते हैं। वरना हम तो हमेशा काजू -बादाम खाते हैं। एक ने जेब से दूसरी पुड़िया निकाली और पप्पा की ओर काजू बढ़ाते हुए बोला

"मालिक लोगों को दिखाने के लिये हम ये मूंगफली की पुड़िया हाथ में रखते हैं। उनको यदि ये पता चल जाए, कि हम काजू-किशमिश खाते हैं,तो बिना वजह उनके सीने में जलन होगी। आप तो अपने आदमी हो आप से क्या छिपाना।"

उनमें से कुछ-कुछ तो बेहद घटिया किस्म के लोग थे। दुनिया की कोई ऐसी बुरी लत नहीं थी जो नूरमहल में ना पाई जाती हो।

सबसे पप्पा की दोस्ती थी। लेकिन इस सब के बीच भी पप्पा अपने आप को संभाले रहे । इस बात पर उन्हें पूरा विश्वास था कि

If the wealth is lost, nothing is lost. If the health is lost, something is lost, but if the character is lost, everything is lost.

ये बात वो हमें तो हमेशा बताते ही रहते थे, लेकिन जब मैं उनकी आपबीती की विडिओ रेकॉर्डिंग कर रही थी तब उन्होंने उनका यह प्रिय वाक्य अपने नाती पोतों के लिए विशेष रूप से फिर दोहराया और मुझसे कहा कि ये बात उन सबको बार बार याद दिलाती रहना।

इस बात का उन्हें बेहद गर्व है कि वे कभी भी यह नहीं भूले कि वे कौन हैं, किस खानदान से ताल्लुक रखते हैं। किस घर के बेटे हैं । इस आत्मबोध ने उन्हें हमेशा सतर्क रखा और एक लक्ष्मण रेखा पार करने से बचाया ।

मुझे इस बात का हमेशा आश्चर्य होता है कि पप्पा ने सिगरेट ,शराब, पत्ते,नसवार, तंबाकू सब कुछ कर के देखा था। उनके कई दोस्तों को अलग-अलग किस्म के व्यसन थे, लेकिन मैंने मेरी जिंदगी में पप्पा को कभी किसी चीज का व्यसन करते नहीं देखा। पान खाने तक का भी नहीं। हम लोग थोड़े बड़े होने पर तो वो जो कभी-कभार थोड़ी व्हिस्की पी लिया करते थे, वह भी बंद हो गई। यहाँ तक की नॉनव्हेज खाना भी उन्होंने कब छोड़ दिया, किसी को पता भी नहीं चला।

पप्पा को जब सरकारी क्वार्टर मिला तो नूरमहल में उदासी छा गई। पप्पा ने किशनदास को ले जाकर घर दिखाया। दूसरे दिन जब ऑफिस से वापस नूरमहल पहुँचे, तो क्या देखते हैं कि उनका सारा सामान कमरे से गायब है। परेशान हो कर जब कमरे से बाहर आए तो लोगों ने खुशी-खुशी बताया

“आपका घर देख कर आए हैं। बहुत अच्छा है। आपको कोई तकलीफ ना हो इसलिए सारा समान हमने खुद ही नये घर में पहुँचा दिया।"

पप्पा बोले "अरे यार तुमने ऐसा क्यों किया। अब मुझे जा कर हर चीज ढूँढनी पड़ेगी कि कहाँ क्या रखा है। मैं अपने हिसाब से सामान जमाता।"

किशनदास बोला "बाबूजी आप बिल्कुल चिंता मत करो। यहाँ जैसे आपका सामान रखा था ना, बिल्कुल वैसा का वैसा ही हमने वहाँ भी जमाया है।"
पप्पा जब अपने घर पहुँचें तो यह देख कर उन्हें बेहद मजा आया, कि उनका सामान बड़ी सावधानी और एहतियात के साथ बिल्कुल उसी तरीके से फैलाया हुआ था, जैसा नूरमहल में था। सामान की दिशा तक नहीं बदली थी। यहाँ तक के उनकी अखबार की रद्दी भी बिल्कुल वैसी ही पसरी थी जैसी नूरमहल में थी।

नौकरी की वजह से भोपाल में रहना पड़ता था, लेकिन वहाँ बिल्कुल मन नहीं लगता था। मौका हो ना हो, बस ग्वालियर भागते रहते थे। पढ़ाई की कोशिश भी चल ही रही थी।

ऑफिस के कोई नियम नहीं मानते थे। कभी समय पर नहीं जाते ,और ना ही वापस आने की कोई जल्दी होती थी।

हँसी मजाक करने और चाय पिलाने की आदत थी ही, आरटीओ ऑफिस के काम के लिये थोड़े ज्यादा बुद्धिमान भी थे। काम करने पर आते, तो फटाफट ढेर फाइलें निबटा देते। लोगों की मदद करने को तो सदैव तत्पर रहते, उस पर ईमानदार भी थे।

देखते ही देखते भोपाल में भी उनका मित्र परिवार बढ़ने लगा। तब उनका बेहद अलग अलग तरह के लोगों से परिचय हुआ, जिनमें ड्रायवर-कंडक्टर से ले कर, मेडिकल कॉलेज के डीन, नेता, राजे, महाराजे, नाई, सब्जीवाला, जूतेवाला कोई भी थे।

बचपन में तो हम लोगों को इतना आश्चर्य होता था, कि जहाँ कोई संबंध नहीं, वहाँ भी उनके अच्छे परिचय के लोग निकल आते। और मजे की बात यह है, कि ये उनके सभी परिचित उन्हें देख कर अपना काम छोड़ कर आते और उन्हें अटेन्ड करते।

ऑफिस में एक बड़े बाबू थे। वे पप्पा के मारे बड़े परेशान थे।

इतनी कम उम्र का लड़का उन्हें अपना स्पर्धक लगता था। उन्हें लगता उनकी कीमत कम हो गई है।

उस पर पप्पा रिश्वत भी नहीं लेते थे तो ज़ाहिर है लोग उन से ही काम करवाना चाहते और वो कितनी भी देर से आएं उनका इंतज़ार करते।

बड़े बाबू ने पप्पा की लेटलतीफी की शिकायत की और पप्पा को समय पर ऑफिस आने की ताकीद मिली।

सुबह जल्दी उठ कर आना पप्पा को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। हालांकि वे हमेशा ही सुबह ५ -५.३० बजे तक उठ ही जाते हैं पर सुबह ऑफिस जाना उन्हे जमता ही नहीं था। व्यायाम करने का बड़ा शौक था। या कहूँ कि यही एक व्यसन था, जो अंतिम समय तक उनके साथ रहा। सिंगल बार,डबल बार और मुगदर फिराना उस ज़माने में उनके पसंदीदा व्यायाम थे। काफी समय उसी में निकल जाता।

फिर एक दिन उन्होने जा कर बड़े बाबू से बात की।

वे कहने लगे “मै भी पहले कभी वक्त पर नहीं आता था, लेकिन तुम्हारी वजह से मुझे भी जल्दी आना पड़ता है।”

फिर पप्पा की उनसे दोस्ती हो गई। पप्पा ने अपने लिए यह नियम बना लिया कि खुद चाहे रिश्वत मत लो, पर दूसरे के मामले में टाँग ना अड़ाओ, तभी इस ऑफिस में गुज़ारा संभव था।

बड़े बाबू बड़े मज़ेदार आदमी थे। बड़ी सी हॅट लगाते थे।

जिस दिन बहुत रिश्वत खाते, उस दिन ऑफिस से बाहर निकल कर आसमान की तरफ हाथ उठा कर कहते “ या खुदा,तेरा लाख लाख शुक्र है तूने बंदे का खयाल रखा।”

जिस दिन कोई ऊपरी आमदनी नहीं होती, उस दिन भी ऑफिस से निकल कर ऊपर की तरफ हाथ उठा कर कहते “ या खुदा, तेरा लाख लाख शुक्र है, कि तूने बंदे को बेईमान होने से बचा लिया।”

उन्हें कम सुनाई देने लगा था। उनकी मेज के सामने लोग आ कर बैठते, और बोलना शुरू करते तो उन्हें कुछ सुनाई नहीं देता। डाँट कर कहते कि ज़ोर से बोलो।

किसी ने सलाह दी कि एक बोर्ड बनवा लीजिए। वे सचमुच एक बोर्ड बनवा लाए जिस पर लिखा था

 ‘कृपया ज़ोर से बोलें ।’

फिर कुछ दिनों बाद समस्या और बढ़ जाने पर, उन्होने डॉक्टर को दिखाया, तो पता चला कि उनका इलाज हो सकता है।

चेन्नई जा कर ऑपरेशन करा के आए। ऑपरेशन के बाद उन्हें ठीक सुनाई देने लगा। लेकिन ऑफिस में तो लोगों को आदत पड़ चुकी थी। जैसे ही वो दिखते, लोग चिल्ला-चिल्ला कर बात करने लगते। कान ठीक होने के बाद उन्हें इससे बेहद तकलीफ होती। फिर वे एक नया बोर्ड बनवा लाए, जिस पर लिखा था

कृपया धीरे बोलें।’

एक बार उनकी जेब कट गई। उसमें उनके ऑपरेशन के सारे बिल और रिपोर्टस् वगैरह थे। इलाज का खर्चा उन्हें ऑफिस से रिएमबर्स होने वाला था।
उन्होने बहुत रोना पीटना मचाया। 
कहने लगे “मैं तो बरबाद हो गया। बिना बिलों के मुझे एक पैसा भी वापस नहीं मिलेगा।”

तब पप्पा ने सारे ऑफिस से चंदा इकट्ठा कर उतने पैसे उन्हें दिए।

बाद में उन्होंने बिना कागजात के अपना बिल रिएमबर्स करवा लिया, लेकिन ये बात उन्होने खुद किसी को कभी नहीं बताई।

                           बाकी अगली बार....

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