बाप रे बाप…७

पप्पा की आई को सिलाई का शौक था। वे खुद मुंबई जा कर सिंगर की एक पैर मशीन खरीद कर लाईं थीं । उस समय पप्पा की उम्र पांच -छ: साल रही होगी। वो भी माँ के साथ मशीन खरीदने मुंबई गये थे। साथ एक बड़ी सी लोहे की कैंची भी थी।

वह मशीन और कैंची आज भी हमारे घर में हैं ।

पप्पा को उस मशीन से बेहद लगाव है। जब भी आई ने उस बाबा आदम के जमाने की पुरानी मशीन को बेच कर नई मशीन खरीदना चाहा ,पप्पा हमेशा विरोध करते रहे हैं ।

बड़े गर्व से हमेशा वो कहते हैं कि एक तो वह ओरिजिनल सिंगर है, दूसरे उनकी माँ की निशानी है, और तीसरे उनके बुरे दिनों की साथी है। इसलिए चाहे वो चले या ना चले, लेकिन कभी बिकेगी नहीं।

और फिर मशीन अब भी कितनी बढ़िया है, ये साबित करने के लिए वो सिंगर का मशीन ऑइल और एक पुराना कपड़ा ले कर मशीन से भिड़ जाते हैं।

पप्पा के इस दावे को जाँचने के लिए मैने उस मशीन का मॉडल नम्बर इंटरनेट पर खोजा। ये सचमुच १९३६ में स्कॉटलॅन्ड में बनी सिंगर है

बहरहाल, पप्पा की उम्र उस समय कुछ बारह तेरह साल थी। वो पैसे कमाने के तरीके सोचने लगे।

उन्होंने माधोगंज में एक टेलर ढूँढा जिसके पास अपनी मशीन नहीं थी, लेकिन वह अच्छे पाजामे सिल लेता था।

दुकान के बाहर एक बड़ा चबूतरा था। उस टेलर को मशीन और कैंची दे कर चबूतरे पर बैठा दिया। माधो गंज बड़ा कपड़ा बाजार था। दिन भर जाने कहाँ कहाँ से लोग आ कर कपड़ा खरीदते और यदि तुरंत पजामे सिल कर देने वाला टेलर हो, तो वहीं बैठ कर सिलवा भी लेते।

उसके साथ यह तय हुआ कि दिन भर में वह जितने पैसे कमाएगा उसमें से  चार आने उसके और बारह आने पप्पा के ,क्योंकि जगह ,मशीन और कैंची पप्पा की थी।

आजोबा की वजह से पप्पा साबुन  बनाना भी जानते थे । घर में तब के पुराने सांचे वगैरह भी पड़े थे। थोड़ा बहुत साबुन बना कर भी बेचने लगे। काका की दुकान में भी कुछ ना कुछ काम कर देते।

जो कुछ थोड़ी बहुत आमदनी होती, वह तीनों भाई बहनों के खर्चे के लिये काकी को दे देते।

नाना को खयाल ही नहीं था, या वह जान बूझ कर अनदेखा कर रहे थे, पता नहीं। लेकिन उन्होंने कभी बेटियों के कपड़ों या अन्य खर्चे के लिये भी पैसे नहीं दिये।

ये लोग जब उनसे मिलने दवाखाने जाते, तो हमेशा की तरह चार ,आठ आने दे देते, लेकिन उससे अधिक कुछ नहीं।

पप्पा का मानना है कि ये नाना का उसूल था, कि वे बिना मांगे किसी की मदद नहीं करते थे और ना कभी किसी को कोई सलाह देते थे।

वे इंतज़ार कर रहे थे कि कोई उनसे कुछ कहे । लेकिन बाकी सब तो उनसे बहुत अधिक डरते थे और पप्पा को उनसे कुछ माँगने की इच्छा नहीं थी। शायद दिल में कहीं ये बात सलती होगी कि उनके कहने पर ही नाना ने घर छोड़ा था।

लेकिन वे मन ही मन ये उम्मीद कर रहे होंगे कि नाना खुद ही कुछ करें । आखिर यह उनकी जिम्मेदारी थी।

इस दौरान पप्पा को हमेशा बुखार आता रहता था। लेकिन उनके पास खुद पर ध्यान देने का वक्त नहीं था। बुखार पूरी तरह उतरने का नाम ही नहीं लेता था।

मुश्किल यह थी कि ना पप्पा नाना के घर जाना चाहते थे, ना ही नाना उनके घर आना चाहते थे।

तबीयत कुछ ज्यादा खराब हो गई, तो नाना ने उन्हें अपने दवाखाने में ही रख लिया।

पप्पा को टीबी हो गया था । pleurisy की वजह से हालत और खराब हो गई थी । उस ज़माने में तपेदिक का मतलब मृत्यु ही था। उनके फेफड़ों से पानी निकाला गया। दवाखाने में नाना और पप्पा दोनों ही रहते। एक ही पलंग था, जिस पर पप्पा सोते ,और एक सोफा था, जिस पर नाना सो जाते।

नाना से जो कुछ बन पड़ा वह सब उन्होंने किया।

एक रात बुखार बहुत बढ़ गया, और पप्पा बेहोश हो गये । नाना शायद पूरी तरह निराश हो गये थे।

पप्पा की आई की मृत्यु भी तपेदिक से ही हुई थी।

पप्पा को छोड़ कर वे पास के हनुमान मंदिर चले गये और घंटों मंदिर की परिक्रमा  करते रहे। हालांकि नाना लगभग नास्तिक ही थे। पूजा वूजा भी कभी-कभार किसी त्यौहार या विशेष अवसर पर ही करते थे ,लेकिन उस समय उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था।

सुबह वापस लौटे तो तब भी पप्पा जीवित थे।

फिर नाना को पता चला कि स्ट्रेप्टोमायसिन नामक नई दवा इजाद हुई है ,जिससे टीबी का इलाज संभव है।

उन्होंने अपने हर संपर्क का इस्तेमाल किया। ना जाने कितने लोगों से मिले और पानी की तरह पैसा बहाया। अमेरिका से स्ट्रेप्टोमायसिन के इंजेक्शन मंगाये गये और पप्पा को लगाये गये। पप्पा उन शुरु शुरू के खुश किस्मतों में से एक थे जो १९४६-४७ के दौरान भी टीबी के चंगुल से बच कर निकले। इसका सारा श्रेय स्ट्रेप्टोमायसिन तथा उसके शोधकर्ता को जाता है।

तबीयत ठीक होने के बाद फिर नाना अपने घर और पप्पा अपने घर ।

तपेदिक ठीक होने के बाद पप्पा को कुछ दिन के लिये आराम करने की सलाह दी गई थी। उनके इलाज पर नाना ने पानी की तरह पैसा बहाया था, लेकिन घर खर्च का सवाल जैसा था वैसा ही था।

पप्पा ने सोचा कि वे बीमारी से नहीं मरे ,लेकिन इतनी महंगी दवा खाकर भी फाँकों से मर जाएंगे।(जब पप्पा ऐसा कहते हैं तो उन पर ज़रा भी विश्वास नहीं होता। यह वाक्य ज़रा अतिरंजित लगता है।)

बहरहाल वे बिस्तर से उठे और अपने कामों से लग गये। पढ़ाई भी साथ-साथ चल ही रही थी।

नाना के एक बहुत पुराने कॉलेज के मित्र डॉक्टर बनने के बाद इंगलैंड चले गये थे। वापस लौटे तब सरकारी नौकरी करने लगे और जल्दी ही हेल्थ सेक्रेटरी बना दिये गये।

एक बार वे नाना से मिलने ग्वालियर आए।

नाना के लिए वे बेहतरीन विदेशी सिगार ले कर आए थे। उन्होंने और नाना ने दोनों ने सिगार सुलगाए। पप्पा बड़ी उत्सुक्ता से देखते खड़े थे।

कुछ देर बाद नाना बोले “यार बुरा मत मानना , तुम्हारे सिगार निश्चित रूप से बेहद कीमती हैं, लेकिन उनमें वो मज़ा नहीं है जो बीड़ी में है।

फिर उन्होंने सिगार फेंक कर बीड़ी सुलगा ली। मित्र कुछ देर देखते रहे ,फिर बोले

“यार,अच्छा नहीं लगता कि तुम बीड़ी पीओ और मैं सिगार, लाओ मुझे भी एक बीड़ी दे दो।” फिर दोनों मित्र खुशी-खुशी बीड़ी फूँकते रहे।

वे नाना से बोले कि मैं इतने महत्वपूर्ण पद पर हूँ, दुनिया भर के लोगों के काम कराता रहता हूँ, और तुम्हारे लिए मैंने आज तक कुछ नहीं किया ,तो मैं तुम्हें सरकारी नौकरी दिलवा देता हूँ।

नाना ने कहा कि उन्होंने कभी किसी की नौकरी की ही नहीं, उनसे नहीं होगा। उस पर वे जिद करने लगे।

कहने लगे, आराम से कहीं सिविल सर्जन बन जाओगे और फिर बाद में पेंशन भी मिलती रहेगी। उनके समझाने बुझाने पर नाना भी मान गये।

ग्वालियर के पास के ही एक कस्बे में उन्हें सिविल सर्जन का पद मिल गया। और वे अपने अस्पताल पर ताला लगा कर वहीं रहने भी चले गये।

पप्पा बहनों का और खुद का खर्चा चलाने के चक्कर में कुछ ना कुछ काम करते रहते।

इतना बड़ा घर था और हाथ रोक कर खर्च करने की आदत कभी किसी को थी ही नहीं।

कितना भी हो हमेशा कम ही होता।

फिर उन्होंने पैसे कमाने की एक नई तरकीब लगाई।

कुछ सिनेमा हॉल वालों से बात की। उस ज़माने में नये सिनेमा का इश्तेहार करने के लिये तांगे पर बड़े बड़े पोस्टर्स लगा कर जोरदार बॅन्ड के साथ जुलूस निकलता था।

पप्पा उस जुलूस के लिये पेट्रोमॅक्स के दिये किराए से देने लगे।

कुछ मजदूर इकट्ठा किये, जो लम्बे बाँस पर पेट्रोमॅक्स लटका कर सिनेमा के जुलूस के साथ-साथ चलते।

जिस जमाने में बिजली नहीं थी, तब रात को जब ये जुलूस निकलते तो अच्छी खासी भीड़ इकट्ठी होती। लोग बड़ी उत्सुकता से देखते।

पप्पा साथ-साथ स्पिरिट की बोतल और आंकड़ा ले कर चलते। जहाँ कोई लालटेन बंद होती तो उसे तुरंत फिर चालू करते।

धीरे धीरे उनके पास ग्वालियर के सभी थियेटरों का काम आ गया। थोड़े बहुत पैसे मिलते, साथ ही हर थियेटर के फ्री पास भी मिल जाते।

इसलिये उनके साथ काम पर उनके बहुत से मित्र भी चलने को उत्सुक रहते।

उस जमाने में रिलीज़ हुई हर फिल्म पप्पा नें देखी हुई है। मेरे खयाल से तो १९६० के दशक तक आई हर फिल्म ही उन्होंने कई बार देखी होगी।

उनका सिनेमा के बारे में अगाध ज्ञान भी इसी की बदौलत है। किसी भी पुरानी फिल्म का नाम लीजिए, वह ना सिर्फ पप्पा ने देखी हुई होती है, बल्कि वो किस साल आई थी, हिरो, हिरोइन, डायरेक्टर, म्युजिक डायरेक्टर सब उन्हें मुँह जबानी याद है।

आई बहुत अच्छा गाती थी,लेकिन पप्पा को हमने कभी गुनगुनाते भी नहीं सुना।

आवाज सुन कर गायक कौन है, ये तो हम सभी बचपन से पहचान लेते थे, लेकिन गाना सुन कर संगीतकार कौन है, ये अचूक पहचानने वाला मैनें पप्पा के सिवा कोई और नहीं देखा। उनका कहना है कि हर एक की अलग स्टाइल है,और हर बार उनका कहना शत प्रतिशत सही निकलता है।

जिस तरह पप्पा की वजह से बहुत बचपन में  चार्ल्स डिकन्स की किताब ‘अ टेल ऑफ टू सिटीज’ के जादू को समझा, उसी तरह न जाने कितने पुराने सिनेमे पप्पा ने आग्रह से दिखाए।

वीसीआर का जमाना आने पर ढेरों पुरानी फिल्में पप्पा के साथ कॅसेट ला कर देखी हैं।

देव आनंद के तो वो दीवाने थे। उनकी वजह से ही फिल्म काला पानी का ’हम बेखुदी में उनको पुकारे चले गये’ गीत आज भी हम सबका का पसंदीदा है।

१९५२ में बनी फिल्म ‘जाल’ में गुरुदत्त के डायरेक्शन के साथ-साथ वो उसकी लिखी कहानी की बात भी करते, हेमंत कुमार की आवाज के साथ एस.डी.बर्मन के संगीत की भी तारीफ करते।

मोतीलाल के स्वाभाविक अभिनय की तारीफ करते वो थकते नहीं हैं।

फिल्म जागते रहो का ‘ज़िंदगी ख्वाब है’, गाना हो, या देवदास फिल्म में चुन्नीलाल का शराब पी कर, खूँटी की परछाई पर छडी टाँगने वाला दृष्य हो, उनके साथ देखने में अलग ही मज़ा आता है। हर बार वो उतने ही मज़े लेते हैं।

यदि उन्होंने ना दिखलाई होती तो ‘छ़ोटी छोटी बातें’ जैसी खूबसूरत फिल्म देखने से मैं वंचित रह जाती। उसमें मोतीलाल के साथ-साथ नादिरा भी हम दोनों को बहुत अच्छी लगती थी।

उन्होनें अछूत कन्या,किस्मत से ले कर दो आँखें बारह हाथ तक और जाल से लेकर बलराज सहानी के गरम कोट तक, ना जाने कितनी बेहतरीन ब्लॅक एँड व्हाइट फिल्में दिखाईं हैं।

फिल्म सोलहवाँ साल के गीत ‘है अपना दिल तो आवारा’ में आर डी बर्मन के बजाए माऊथ ऑर्गन की वे जितनी बार गीत सुनते उतनी बार तारीफ करते हैं।

गीत, डायलॉग, कहानी हर चीज में उन्हें रस है।

ठोकर फिल्म के तलत महमूद ने गाये गीत ‘ऐ गमें दिल क्या करूँ’ का हर शब्द किसी जमाने में उन्हें अपनी कहानी लगता था।

ये रुपहली छाँव ये आकाश पर तारों का जाल

जैसे सूफ़ी का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल

आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल

रास्ते मे रुक के दम लू, ये मेरी आदत नही

लौट कर वापस चला जाऊँ मेरी फितरत नही

और कोई हमनवा मिल जाए ये किस्मत नहीं।

न जाने कितनी बार उनसे मजाज़ की इन पंक्तियों की तारीफ सुनी है।

वहीं दूसरी ओर फिल्म ओमकारा का ‘बीड़ी जलई ले जिगर से पिया’ या फिर थ्री इडियट का ‘ऑल इज वेल’ गाना भी वो बड़े मजे से सुनते हैं। उन्हें नये से भी बिल्कुल परहेज नहीं है।

उनके कारण ही हम तीनों भाई बहन के.सी.डे और पंकज मलिक से ले कर सहगल और जगमोहन सूर सागर तक हर गायक को शौक से सुनना सीख गये हैं।

ना जाने कैसे ,लेकिन पप्पा को ढेरों गैर फिल्मी गीत भी मालूम हैं।

१९७५-७६ के आसपास जब हमारे घर पहली बार टेपरेकॉर्डर आया तब पप्पा ना जाने कितने नये पुराने गीत और गज़ले हमें सुनवाने के लिए कॅसेट पर रेकॉर्ड करवा कर लाते थे।

हालांकि मैं पप्पा की कहानी से थोड़ा भटक रही हूँ लेकिन आज पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो एहसास होता है कि सौंदर्य दृष्टि, संगीत और शब्दों के प्रति प्रेम ये सब उनकी ही देन है।

और उनका इन बातों से संबंध ही न आता यदि उनका बचपन इतना अजीबो गरीब ना होता।

सब कुछ वाकई बड़ा ही ऊटपटांग और विलक्षण लगता है।

कहाँ तो उनके दादाजी और पिता इतने प्रतिष्ठित और रईस व्यक्ति थे, और कहाँ डॉक्टर पिता के जीते जी पप्पा आठ और बारह आने कमाने की जुगत में लगे रहते कि शाम को खाना खाते समय बहनों को किसी की चार बातें ना सुनना पड़ें।

मुझे ये बात भी बड़ी कमाल की लगती है कि पप्पा के इस तरह के काम करने पर किसी को कोई ऐतराज नहीं था। खानदान की इज्जत वगैरह की कोई बात नहीं हुई।

उस पर पप्पा कहते हैं कि ये उनके खानदान की परंपरा ही रही है। किसी काम में कोई शर्म नहीं जब तक तुम मेहनत से कमा रहे हो ,इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण उनके आजोबा ही थे।

तो पप्पा को इन कामों में या ऐसे ही तथाकथित कम सामाजिक स्तर वाले किसी भी काम को करने में तब या फिर बाद के जीवन में भी कभी कोई दिक्कत नहीं आई।

उनका आत्मविश्वास ही इतना जबरदस्त था कि वे जो कुछ करते लोगों को लगता इस काम में जरूर कुछ बात है।

बाकी अगली बार….

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