बाप रे बाप -२

पप्पा को फिल्म शराबी का एक डायलॉग बेहद पसंद है। उन्हें लगता है मानो वो उनके लिये ही लिखा गया हो।

वो डायलॉग कुछ इस तरह था , “ तेरा तारीख को मैं इस दुनिया में आया। आया क्या जनाब, इस दुनिया में फेंक दिया गया।”

पप्पा का जन्म १३ मई को बुंदेलखंड के चरखारी नाम के गाँव में हुआ था। पप्पा से पहले की आठ संतानों की मृत्यु हो चुकी थी। बड़े व्रतों और मन्नतों के बाद  पप्पा पैदा हुए। उनके जन्म के समय उनकी माँ की अवस्था इतनी खराब थी कि उनका बचना भी मुश्किल लग रहा था। सब लोग उनकी तीमारदारी में लगे थे। इस दौरान पप्पा की एक मौसी इस नतीजे पर पहुँची कि सारे फसाद की जड़ यह बच्चा ही है। उसे उस नवजात शिशु पर इतना गुस्सा आने लगा कि उसने आव देखा ना ताव, बच्चे को उठाया और सीधे गाँव की सीमा पर एक मंदिर था, वहाँ भगवान के सामने डाल आई। सारी गड़बड़ में बच्चे की तरफ किसी का ध्यान ही नहीं था । जब माँ की हालत सुधरने लगी तो लोगों को बच्चे का खयाल आया। जब मौसी का कारनामा पता चला तो सब मंदिर की तरफ दौड़े। वहाँ पप्पा बेचारे आराम से रात भर शायद भगवान जी से गुफ्तगू करते पड़े थे।

वह मंदिर वासुदेव का था, इसलिये पप्पा का नाम वासुदेव रखा गया। लेकिन इस नाम की अपेक्षा राजा के नाम से उन्हें लोग अधिक जानते हैं।

इतने बच्चों की मृत्यु के बाद जन्मा बच्चा। वह जीवित रहे इसलिये उस समय १९३३ में जो कुछ उपाय करना संभव थे वह सब किये गये।

उन्हें पहले एक भंगिन की टोकरी में डाला गया ताकि मृत्यु धोखा खा जाए, कि यह किसका बच्चा है। उसके बाद ही वे अपनी माँ के पास पहुँचे।

उनके कान और नाक छेदे गये। पैरों में चांदी कि बेड़ियाँ डाली गईं। और न जाने क्या-क्या किया  गया ।

पप्पा के जीवन में  इतने जानलेवा हादसे हुए हैं कि हैरानी होती है वो बच कैसे गये? पर सचमुच वो तो बचपन से मृत्यु को धोखा देते रहे हैं।

पप्पा पैदा होने इतनी दूर बुंदेलखंड कैसे  पहुंच गये ऐसा हम उनसे मज़ाक में पूछा करते थे।

दरअसल जब बाजीराव पेशवा छत्रसाल के बुलावे पर बुंदेलखंड गये थे, तब उनके साथ गये कुछ लोग वापस पुणे लौटे ही नहीं ।वहीं रुक गये। उन्हें बुंदेलखंड में ही जागीरें दे दी गईं।

उन्हीं में से एक वे केळकर थे जिनके खानदान की बेटी पप्पा की माँ थी ।

पप्पा के आजोबा यानि दादा जी भी इसी तरह महाराष्ट्र छोड़ कर ग्वालियर पहुँच गये थे । ये जो अलग-अलग वजहों से अपना घर छोड़ कर दूर जा बसे लोग होते हैं ना उनकी जड़ें भी हिली हुई ही होती हैं । बहुत पीछे तक ढूँढ पाना बड़ा मुश्किल होता है ।

पप्पा की उनके आजोबा के साथ खूब दोस्ती थी। पप्पा जब दस साल के थे तब उनकी मृत्यु हुई किंतु पप्पा को वे बेहद अच्छे से याद हैं।

रोज शाम को दोनों घर के बाहर के चबूतरे पर बैठ कर खूब गप्पें लगाते। आजोबा पप्पा को खूब नमक- मिर्ची लगा कर उनके जीवन के किस्से सुनाते, लेकिन जो भी सुनाते वह उनके जीवन में घटी घटना होती। मनगढ़ंत किस्से उन्होंने कभी नहीं सुनाये।

उनका नाम विष्णु विनायक अभ्यंकर था। वे बेहद कुशाग्र बुद्धि के हरफनमौला व्यक्ति थे। 6 फुट 2 इंच ऊँचे थे और कुछ झुक कर चला करते थे। बचपन से ही उन्हें मशीनों और औजारों का बहुत शौक था । वे अपना सारा समय उसी में बिताते। इस वजह से उनका भाइयों के साथ झगड़ा होता रहता  । तब भी वे लकड़ी की गाड़ियां बना कर बाज़ार में बेचते । घर के अन्य लोगों को एक कर्मकांडी, पूजा-पाठ  को धर्म मानने वाले ब्राह्मण परिवार के लड़के का इस तरह बढ़ई का काम करना बहुत शर्मनाक लगता। विष्णु पंत ने जाने कहाँ -कहाँ से बड़ी मेहनत से बहुत से बेहतरीन औजार इकट्ठे किये थे। एक बार झगड़ा बढ़ गया और भाई ने वे सारे औजार उठा कर नदी में फेंक दिये। विष्णु पंत इतना नाराज हुए कि अब कभी ना तो कभी घर में कदम रखेंगे, और ना ही कभी घरवालों का मुहँ देखेंगे ऐसी कसम खा कर घर छोड़ दिया ।

अपनी यह कसम उन्होंने खुद तो जीवन भर निभाई ही, लेकिन अपनी पत्नी और बच्चों को भी कभी पिछले जीवन के बारे में एक शब्द भी नहीं बोलने दिया।

पप्पा ने जब एक बार उनसे अपने खानदान के इतिहास के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि ये तुम हो और यही इस अभ्यंकर की शुरुआत है । पीछे कुछ नहीं होता , बस आगे ही देखो ।

उनका मूल कहाँ का था ये पप्पा नहीं जानते ,उनके मन में ये सवाल ही तब तक नहीं उठा था ,जब तक आई ने नहीं पूछा था।

वे पुणेरी पगड़ी लगाया करते थे। और बड़ौदा के किसी टेक्निकल कॉलेज से उन्होंने कोई तकनीकी डिग्री हासिल की थी। उनकी बातों से पापा को ये पता चला था कि वे कुछ दिन धार और फिर कई साल मुंबई में रहे । मुंबई के क्रॉफर्ड मार्केट में उनकी खुद की एक  प्रिंटिंग प्रेस थी । पप्पा के पिता नारायण भी मुंबई के मेडिकल कॉलेज में ही पढ़े थे ।

तभी शायद 1920 या 1922 में विष्णु पंत की ख्याति सुन कर ग्वाल्हेर के थोरले माधव राव शिंदे महाराज ने उन्हें ग्वालियर आने का निमंत्रण दिया। वे ग्वालियर में एक प्रिंटिंग प्रेस शुरू करना चाहते थे । उसके लिये एक इमारत बांधी जा चुकी थी। विदेशों से मशीनें भी आयात की जा चुकी थीं। किंतु उन मशीनों को चालू कैसे करना है ये कोई नहीं समझ पा रहा था। और विष्णु पंत इस काम के विशेषज्ञ समझे जाते थे ।

तब उन्हें तनख्वाह दी गई 150 रुपये, और वह उस समय ग्वाल्हेर स्टेट की सबसे अधिक तनख्वाह थी । विष्णु पंत ने ग्वालियर आ कर प्रेस चालू किया। उस प्रेस का नाम अलीजहा बहादुर प्रेस था। ‘अलीजहा बहादुर’ माधव राव शिंदे को मिली हुई उपाधि थी। विष्णु पंत का गुस्सा मशहूर था। एक बार जब सिंधिया के मंत्री शिर्के उन से प्रेस चालू करने में समय क्यों लग रहा है ,ये पूछने आए, तब वे हथौड़े से कुछ ठोक रहे थे। काम में खलल पड़ने पर उन्हें इतना गुस्सा आया कि वही हथौड़ा ले कर शिर्के को मारने दौड़े। प्रेस चालू होने पर उनका बहुत नाम हुआ । ग्वालियर में वे फाउंडर साहब के नाम से प्रसिद्ध थे। लेकिन वे शिंदे परिवार से हमेशा नाखुश रहे। जब उनका दरबार होता तो वहाँ झुक कर सजदा करना पड़ता, इसलिये ये नहीं जाते। महाराज से बख्शीश लेने में उन्हें शर्म महसूस होती। वे अक्सर शिंदे लोगों को कोसते रहते। उनका खयाल था कि महाराज की बातों में आ कर वे बिना वजह ग्वालियर में आ फँसे थे। यदि मुंबई में होते तो अपनी मर्ज़ी के मालिक होते। वे तो वैसे भी किसी की नहीं सुनते थे। एक दिन गुस्से में आ कर नौकरी छोड़ दी।

उनके स्वयं के भी कई व्यवसाय थे। एक साबुन का कारखाना था। वाड़े पर एक साबुन बेचने के लिये दुकान भी थी।

बारूद और विस्फोटकों का उन्हें विशेष ज्ञान था। दूर-दूर से यह काम सीखने के लिये उनके पास आ कर लोग रहते थे। रबर स्टॅम्पस् बनाना मेरी आई के पिताजी ने उनसे ही सीखा था। जब ग्वालियर में बिजली नहीं थी तब पहली और एकमात्र पेट्रोमेंक्स के दियों की दुकान उन्हीं की थी। सिंधिया के महलों के कार्यक्रमों में , शादियों से ले कर मय्यतों में हर जगह उनके ही दिये किराए से जाते। बाद में उन्होंने रॉकेल के स्टोव बेचना भी शुरू किया।

पप्पा की आजी ठिगनी और आजोबा की तुलना में काफी सामान्य बुद्धिमत्ता वाली स्त्री थी।

उनकी शादी की भी एक कथा ही थी। उनकी सगाई के दिन ही इनकी माँ का देहान्त हो गया। विष्णु पंत के पिता और भाई इस नतीजे पर पहुँचे कि लड़की मनहूस है अतः यह विवाह तोड़ देना चाहिये। पर विष्णु पंत ज़िद पर अड़ गये, कि विवाह करूँगा तो इसी लड़की से। जब घर वालों ने साथ देने से इनकार किया, तो खुद अकेले जा कर शादी कर आए। इस कारण भी भाइयों से उनका मनमुटाव बढ़ता ही रहा था।

उन्होंने कभी धन संचय करने का विचार नहीं किया। अलबत्ता लोहे से उन्हें बेहद प्यार था। घर में जहाँ तहाँ लोहे के हथियार पड़े रहते। मेरे बचपन में भी हमारे घर में लोहे के कुछ ऐसे खास बर्तन थे जो आजी की ज़रूरत के मुताबिक बनाए गये थे। उनमें से एक सेवई बनाने की मशीन तो मुझे आज भी याद है। उसके पैर (स्टँड) भी आजी की ऊँचाई के हिसाब से बने थे।

दिन भर ठोका-ठाकी के काम करने की वजह से उनकी  सेहत भी जबरदस्त थी।  उनका हाथ कितनी जोर से लगता था ,यह पप्पा को आज भी याद है। दिन भर उनके घर अलग-अलग चीजें सीखने वालों की भीड़ लगी रहती। घर में भी रोज खाने पर 8-10 लोग ज्यादा होते।

लेकिन रोज शाम उनकी पप्पा के लिये रिजर्व होती। घर के बाहर के चबूतरे पर दादा पोता बैठ कर दुनिया भर की बातें करते। जिसमें अक्सर वे सिंधियाओं को कोसते और तरह-तरह से पप्पा को समझाते कि जिंदगी में चाहे कुछ भी कर लो पर कभी किसी की नौकरी मत करो, जिस दिन उन्होंने शिंदे की नौकरी शुरू की, उनकी तरक्की रुक गई । बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी लेकिन ग्वालियर नहीं छूटा। पप्पा के दिमाग में यह बात उन्होंने इतनी ठूँस-ठूँस कर भर दी थी कि इंसान को अपना काम खुद अपनी शर्तों पर ही करना चाहिये। चाहे चार पैसे कम मिलें पर कभी किसी की गुलामी मत करो।

घर में एक तुलसी का पौधा था। वे अक्सर उसे दिखा कर कहते कि मेरा जीवन तुलसी के पत्ते की तरह है ,आज पेड़ पर है ,कल नहीं रहेगा। ये बात वे बहुत बार दोहराते थे।

उन्हें बीड़ी पीने की आदत थी। दिन भर वे अनगिनत बीड़ियाँ पी जाते । उनकी वजह से पप्पा के पिताजी को भी बीड़ी पीने की आदत लग गई थी। वे स्वयं डॉक्टर थे  लेकिन सिगरेट कभी नहीं पीते थे। हमेशा बीड़ी ही पीते थे।

बीड़ी की एक बड़ी रोचक घटना है। पप्पा का एक कुछ बड़ा मित्र था ,जिसके पिता उनके घर में नौकर थे। एक दिन उसने आग्रह किया कि चलो हम भी बीड़ी पीयें। तब पप्पा की उम्र पाँच -छ: साल की थी। उन्हें भी कल्पना बहुत अच्छी लगी। बीड़ी मिलना तो कोई मुश्किल नहीं था ।किसी भी जेब में हाथ डाला तो एक ना एक बंडल निकल ही आता । बीड़ी का बंडल ले कर दोनों छत पर पहुँचे। छत पर एक खटिया पड़ी थी । उसे खड़ा कर दोनों उसके पीछे छिप गये । मित्र ने बड़ी अदा से बीड़ी सुलगाई और धुआँ छोड़ने लगा। पप्पा का पहला ही अनुभव था । उन्हें खाँसी का जम के दौरा पड़ा । खाँसते-खाँसते ऊपर नजर गई तो देखा खटिया के दूसरी ओर माँ खड़ी थी। वे एक शब्द भी नहीं बोली। पर वो बेहद दुखी दिख रहीं थीं। इसके बाद इस घटना की कभी चर्चा भी नहीं हुई । उसके बाद जल्दी ही उनकी मृत्यु हो गई । लेकिन उनके चेहरे के उस दिन के वो भाव और उनकी आँखों का वह दुःख और निराशा पप्पा कभी भी नहीं भूल पाए ।

जिंदगी में पप्पा ने बहुत से उलटे सीधे काम किये, घटिया से घटिया लोगों से उनकी बड़ी निकटतम दोस्ती रही।  हर तरह के दोस्तों के बीच वो रहे। किसी बात के लिये ना तो कोई टोकने वाला बाकी था, ना रोकने वाला । दुनिया भर की बुराईयों का उन्होंने  first hand अनुभव लिया लेकिन फिर भी एक हद वे  कभी नहीं पार कर सके।  वे आँखें हर बार सामने आ जातीं। गिरने की कगार तक जा कर संभल गये। पप्पा का ऐसा मानना है कि उन आँखों के दुख और निराशा का डर उन्हें रोकता रहा। पप्पा ने किसी भी प्रकार के मित्र  से दोस्ती कभी नहीं तोड़ी लेकिन कभी दोस्तों का अनुकरण भी नहीं किया। बस वही करते रहे जो उन्हें ठीक लगा।

विष्णुपंत के दो ही बेटे थे । पप्पा के पिताजी डॉ. नारायण विष्णु अभ्यंकर और काका दिनकर विष्णु अभ्यंकर। पप्पा से पहले डॉक्टर साहब का  कोई बच्चा जीवित नहीं रहा था। पप्पा से पहले आठ बच्चों की मृत्यु हो चुकी थी। विष्णुपंत का चार आंगन वाला एक बड़ा सा वाडा था। उसकी तीसरी मंजिल से गिर कर पप्पा की बारह साल की एक बहन की मृत्यु हुई थी। पप्पा की आजी हर बच्चे की मृत्यु के बाद घर बदलती ,लेकिन मौतों का सिलसिला नहीं रुका।

बड़े व्रतों मन्नतों के बाद काका की एक बेटी, पप्पा और उनके बाद दो बहने जीवित रहे।

इतने सालों के बाद और इतने बच्चों के बाद जीवित बचे पोते के बेहद  लाड़ प्यार तो होने ही थे। पप्पा की जनेऊ के बाद भिक्षा मांगने वे  हाथी पर निकले थे और उस रात को तवायफों के नाच गाने का कार्यक्रम हुआ था, जिसका वर्णन सालों बाद भी लोग हमें सुनाया करते थे।

उस जमाने में उनके घर रोज के खाना खाने के सारे बर्तन भी चांदी के हुआ करते थे।

पप्पा सही मायने में born with silver spoon थे। बस किस्मत का चक्कर कुछ ऐसा चला कि कुछ ही सालों में ना तो silver ही रहा और ना ही spoon।

विष्णु पंत को अपने छोटे बेटे से विशेष लगाव था। बड़े की उन्हें कोई चिंता नहीं थी वह तो डॉक्टर बन ही चुका था। छोटा भी बहुत पढ़े ऐसी उनकी इच्छा थी।

लेकिन पप्पा के काका का मन पढ़ने में बिल्कुल नहीं लगता था। जैसे तैसे वो मॅट्रिक हुए। काका अपने पिताजी से बेहद डरते थे। पहली बार जब वे मॅट्रिक में फेल हुए तो मारे डर के भाई के पास मुंबई भाग गये। फिर पप्पा के पिताजी ,जिन्हें नाना कहा जाता था उन्हें वापस ले कर आए। उन्होंने ही अपने  पिता को भी समझाया। बाद में काका मॅट्रिक पास हुए। काका के लिये ही आजोबा ने पेट्रोमेक्स की दुकान खोली थी। साबुन की फॅक्ट्री का नाम भी छोटी बहू के नाम पर ही कमला सोप फॅक्ट्री था।

पप्पा के जीवन में और स्वभाव में उनके आजोबा का बेहद प्रभाव रहा।

विष्णुपंत मृत्यु के समय लगभग सत्तर वर्ष के थे। एक दिन अचानक उन्हें जोर की ठंड लगने लगी और तेज बुखार चढ़ा। दूसरे दिन शाम को वे चल बसे। अंतिम समय उन्हें सिर्फ छोटे बेटे की ही चिंता थी।

आजोबा की मृत्यु हुई तब पप्पा की छोटी बहन शालू सिर्फ चार साल की थी। आजोबा का जब अंत बिल्कुल निकट था और घर में तमाम लोग इकट्ठे हो गये थे, तब शायद वह घर का तनाव पू्र्ण वातावरण देख कर घबरा गई।

उसने ग्रामोफोन पर फिल्म किस्मत का ‘अब कौन मेरा तेरे सिवा कृष्ण कन्हैया, अब तू ही किनारे से लगा दे मेरी नैया ‘ वाला रेकॉर्ड लगाया और साथ-साथ खुद भी गाने  लगी। लोगों ने जब उसे डाँटा तो आजोबा ने इशारे से कहा कि उसे गाने दो। यह घटना बरसों बाद भी मजाक का विषय बनी रही।

बाकी अगली बार………

3 thoughts on “बाप रे बाप -२

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  1. हॅलो स्वाती ,
    मनीषाने मुज़े तुम्हारे ब्लॉग के बारेमे कुछ पंधरा दिन पहले बताया तबसे मैं इसकी नियमित वाचक हूँ.
    मेरी हिंदी हालाँकि बहोत कमजोर है , फिरभी मैं हिन्दीमे कमेंट लीखनेका प्रयास करुँगी.
    स्वाती, तुम्हारी भाषाशैली बहोत ही प्रभावी और असरदार है. मुज़े तो मानो रोजका एक नया अड्डा मिल गया . ऑफिस खत्म होतेही रोज़ थोड़ी देर तुम्हारा ब्लॉग जरूर पढ़ती हूँ.
    मुखपृष्ठ तो ‘वाह भाई वाह’ . कबीरजी के बारेमे भी मुज़े ज्यादा जानकारी नहीं थी . तुम्हारा लेख पढके अब लग रहा है की उनका साहित्य बहोत ही दिलचस्प है. तुम्हारा हाथ पकड़ कर उनके साहित्यकी सैर करना बहोत अच्छा लगेगा.
    अभी दीर्घ कथाएं पढ़ी नहीं है मैंने पर जरूर पढूंगी.
    ‘बाप रे बाप’ के बारेमे तो क्या कहुँ ? तुम्हारे पापाकी जिंदगी ज्यादा रोचक है या तुम्हारी शैली उसे और दिलचस्प बना रही है ये तय करना बहोत ही मुश्किल है . मन ही मन मैं तुम्हारे अगले पोस्टिंग की रह देखती रहती हूँ. उनके आखिरी बीमारीके वक्त मनीषासे मेरी अक्सर बातें होती थी पर मैंने कभी उनसे मिलनेकी कोशिष न करी. चलो अब तुम्हारे ब्लॉगके जरिये उनसे मुलाकत होगी.
    मनीषा के जन्मदिवस पे तुमने जो कविता पढ़ी थी वो नहीं है क्या ब्लॉग पे ?
    और भी नए नए विषयोंके बारेमे तुम्हारे विचार पढ़ना बहोत रोचक होगा.
    मिलते है कभी….
    – नयी दोस्त वर्षा ( c /o मनीषा )

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