बाप रे बाप…१

पप्पा अब नहीं हैं ,ये कहना गलत ही होगा। कोई दिन ऐसा नहीं जाता, जब उनकी कोई ना कोई बात याद ना आई हो। वो बहुत अधिक बातूनी थे। लेकिन उनका खयाल था कि मुझसे उनका कोई मुकाबला नहीं है। उनसे बात करने में मज़ा आता था। वो भी हर बात के मज़े लेते थे। बेहद हाज़िर जवाब थे वो।

एक दिन सुबह-सुबह उनका फोन आया। कहने लगे

“ मैं बहुत परेशान हूँ। आजकल कुछ याद नहीं रहता। दिमाग ही काम नहीं करता आजकल। पुरानी पुरानी बातें दिमाग में बिल्कुल ताज़ा हैं ,लेकिन आज सुबह की बात भूल जाता हूँ।”

मैने कहा “ पप्पा बुढ्ढे हो गये हो।”

और फिर लगे हाथ मैनें उन्हें दाग दहलवी का एक शेर भी सुना दिया कि

“ होशो हवास, ताबो तवाँ दाग़ जा चुके    ( ताबो तवाँ- हाथों की ताकत)

अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया।”

कोई और होता तो शायद ये सुन कर आहत होता, लेकिन पप्पा बिना एक क्षण गवाएँ बोले कि क्या बताऊँ बेटा

“मुझे थकने नहीं देता ये ज़रूरत का पहाड़

मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते।”

उनकी जीवन कहानी मैने कुछ साल पहले लिखना शुरू किया था।

पप्पा की याददाश्त ज़बरदस्त थी। कुछ भी भूलना उन्हें नागवार था। वो अपनी ज़िंदगी के जो भी किस्से सुनाते साल, तारीख और नामों सहित बताते। मैं जब लिखने बैठती तो बहुत सी छोटी-छोटी बातें भूल जाती। फिर मैनें उनकी बातें विडिओ रेकॉर्ड करना शुरू कर दिया। कभी-कभी जानबूझ कर कई बातें मैं कुछ महीने बाद उन्हें फिर दोहराने को कहती। वो वजह पूछते तो साफ-साफ बता देती कि देखना चाहती हूँ कि सच बात थी या गप थी। वकील हो कर भी पप्पा को कभी झूठ बोलना नहीं आया। उनकी कहानी हमेशा जैसी की तैसी होती।

मेरा लिखा उन्होंने कई बार पढ़ा, सुधारा।

लोग कहते कि उनकी कहानी पर एक किताब छापो। वो कहते पहले कहानी खत्म तो होने दो।

हमारा यह विडिओ रेकॉर्डिंग का सिलसिला रुक-रुक कर चलता रहता। हम दोनों ने ही उसका बहुत आनंद उठाया।

इतने सालों के बाद उन्होंने मुझे इस काबिल भी समझा कि अपने जीवन की कुछ अनकही बातें भी बताई। उन्हें लगा कि मैं शायद अब इतनी बड़ी हो चुकी हूँ, कि समझ सकूंगी। कई बातें ऐसी भी होती कि वो कहते कॅमेरा बंद कर,ये ऑफ द रेकॉर्ड है।

आखिर २९ अप्रेल २०१५ को उन्होनें इस दुनिया में अपनी अंतिम साँस ली। लेकिन उनकी कहानी तो अब भी चल ही रही है। विडिओ रेकॉर्डिंग के रूप में वो अब हमेशा के लिए मेरे साथ हैं। जब चाहती हूँ उनकी कहानी उनकी ही ज़बानी सुनती हूँ।

यहाँ मेरे ब्लॉग पर मैं उनकी जीवन यात्रा धारावाहिक के रूप में पब्लिश कर रही हूँ। कोशिश करूँगी कि हर महीने एक भाग पोस्ट करूँ।

पप्पा जैसा दबंग व्यक्ति मैने मेरे जीवन में दूसरा नहीं देखा। उन्हें देख कर अक्सर कहना पड़ता था

“ बाप रे बाप….”

                                                                                                                                                                   बाप रे बाप…..१

आज तक कभी पप्पा के नाम की नेमप्लेट बनी ही नहीं। उन्होंने खुद ही नहीं बनने दी। यह उनकी कुछ सनकी किस्म की जिदों में से एक हैं जो उन्होंने उम्र भर बड़े शौक से निभाई हैं। जैसे उन्होंने कभी घर के या ऑफिस के बाहर खुद के नाम की प्लेट नहीं लगवाई ।जब उन्होंने एकदम नई वकालत शुरू की थी तब भी नहीं।

“मैं तो एकदम फालतू आदमी हूँ यार, मेरे नाम की तख्ती कहीं लगाने की ज़रूरत नहीं।”

वे कहते।

जब उन्हें कोई समझाने की कोशिश करता,तो कहते

“जिसे मेरी ज़रूरत होती है ,वो चाहे जैसे भी हो ढूंढता-ढांढता आ ही जाता है, नेमप्लेट से क्या होना है?”

और सचमुच एक वक्त ऐसा था, जब हमारे घर के सामने जैसी राशन की दुकान के सामने होती है, वैसी एक लम्बी लाइन उनके क्लाइंट्स् की लगी होती थी ।

रोज शाम को ऑफिस से घर आने पर पप्पा हाथ में चाय का कप ले कर बाहर के आंगन में बैठ जाते। उन्हें आराम से बैठा देख कर,सामने से आने जाने वाला कोई ना कोई परिचित उनसे गप्पें लगाने आ ही बैठता ।

पप्पा से गप्पें मारना, मतलब अक्सर (लगभग हमेशा ही) उनकी ही सुनना होता है। उनके पास कभी खत्म ना होने वाले किस्सों का भंडार जो है। उनकी जिंदगी में घटी भी इतनी अजीबोगरीब घटनाएँ हैं ना, कि “जीना” इस विषय में उनसे कोई कॉम्पिटीशन ही नहीं कर सकता।

एक तो इतने अद्भुत किस्से और वो भी सच, उस पर पप्पा का रसीला अंदाज ,सुनने वालों को मज़ा तो आना ही हुआ। उनके ना जाने ऐसे कितने किस्से हैं, जो हमें तो हमें, पड़ोसियों को भी ज़बानी याद थे, और फिर भी लोग वही बातें उनसे फिर -फिर सुनना चाहते।

अक्सर शाम को कुछ लोग इकट्ठा हो ही जाते। हम सब आ कर आँगन में उनके चारों ओर प्रजा की तरह बैठ जाते। कुर्सियों की संख्या लिमिटेड होने की वजह से कभी-कभी तो फर्शी के टुकड़ों और पत्थरों पर भी लोग बैठे नज़र आते। फिर कोई सीधे-सीधे मांग करता कि मामूजी वो वाला किस्सा सुनाइये ना, जब आप बाढ़ वाली नदी में गिरे थे।

पप्पा एक जोरदार ठहाका लगाते।

उन्हें हँसी बहुत ज्यादा आती है, और धीरे से मुस्कुराना-वुस्कुराना तो उन्हें आता ही नहीं। एकदम गड़गड़ाहट ही। उनका हर काम ऐसा ही होता है। एकदम जोरदार। हँसना, बोलना, चिड़ना, गुस्सा होना, कुछ भी वो कभी चार लोगों जैसा नहीं कर पाए। यदि ठसका भी लगता है ना उन्हें कभी, तो लगता है कि इनकी जान ही जाएगी अब।

पिक्चर देखते समय कोई इमोशनल दृश्य हो, तो एकदम सहजता से उनकी आँख भर आती है, और वो कभी उसे छिपाने की कोशिश भी नहीं करते।

चिढ़ कर चिल्लाते हैं तो इतनी जोर से कि सारा घर सर पर उठा लेते हैं। गुस्सा ऐसा कि पारा एकदम थर्मामीटर फोड़ कर ही बाहर निकले। पर जितनी जल्दी गरम होते हैं, उतनी ही जल्दी ठंडे भी हो जाते हैं।

एक बार पुणे आए थे। मनीषा के साथ जंगली महाराज रोड से जा रहे थे। चलते-चलते उनके जूते का सोल निकल गया। बाल गंधर्व के सामने के फुटपाथ पर बैठे मोची को उन्होंने जूता ठीक करने को दिया। उसने सोल में दो कीलें ठोकी और पूछा कि साहब पॉलिश भी कर दूं क्या? हाँ कहने पर पॉलिश कर के जूता वापस दिया। पप्पा ने पूछा “कितने पैसे हुए?”

“चालीस रुपये दे दो साहब।“  वो आराम से बोला।

सटाक! पप्पा ने उसे एक जोरदार झापड़ लगाया। बेचारा उकड़ु बैठा था। लुढ़कता हुआ फुटपाथ से नीचे जा गिरा।

“पप्पा क्या कर रहे हो ?” मनीषा चिल्ला रही थी। पर यहाँ सुनता कौन है?

पप्पा ने उसे उठा कर बैठाया और फिर पूछा ” ठीक बोल,कितने पैसे हुए?”

उस गरीब बेचारे को एकदम ‘कितने आदमी थे’ ही याद आया होगा। बोला “कुछ मत दो साहब”।

पप्पा ने फिर हाथ उठाया “कितने?”

“पाँच रुपये दे दो साहब”

पप्पा ने उसे पैसे दिये और मानो कुछ हुआ ही ना हो इस अंदाज में मनीषा से बोले

“बेवजह गलत बात करने लगा था यार” ।

घर आने पर मनीषा से यह किस्सा सुन कर हम सब बहुत चिल्लाए कि इस तरह की हरकतें कितनी खतरनाक साबित हो सकती हैं और वो बहुत हँसे।

बोले “लातों के भूत बातों से नहीं मानते”।

एक बार उनकी सत्तरवीं सालगिरह वाले दिन मैं उनके साथ स्कूटर पर पीछे बैठ कर इंदौर के बाज़ार में मिठाई लेने जा रही थी।

बीच रास्ते में एक मारुति वाले ने अचानक ब्रेक लगाया और उसके पीछे हम गिरते-गिरते बचे।

पप्पा ने उसे फुल वॉल्युम में गालियाँ देना शुरू कर दिया।

हमारी आई के मुहँ से कभी गलती से भी कोई अपशब्द बाहर नहीं निकलता। कितना भी गुस्सा आ जाए, पर वो कभी पागल या गधा भी नहीं कह पाती, और दूसरी तरफ पप्पा हैं , जो बेझिझक ,बेधड़क ,बिना किसी का लिहाज़ किये, बेहद गंदी गालियां, इतनी सहजता से बक सकते हैं ,मानो सुबह-शाम की आदत हो।

इसलिये मुझे दोनों के प्रति ही बेहद आदर महसूस होता है।

तो पप्पा उस मारुति वाले को गालियां दिये जाएं,और हर वाक्य में दो बार ये ज़रूर बोलें कि मैं सत्तर साल का बूढ़ा…..।

“मैं सत्तर साल का बूढ़ा देख कर गाड़ी चला सकता हूँ तो तुम साले ****की क्या आँखें फूट गई हैं। मैं सत्तर साल का बूढ़ा गिर जाता तो इस उम्र में साली हड्डी भी नहीं जुड़ती****।मैं सत्तर साल का बूढ़ा……वगैरह-वगैरह।

आखिर मुझसे ही नहीं रहा गया ।

“अब बस ना ये सत्तर साल की कथा”

वो गाड़ी वाला भी उनका जोश देख कहने लगा कि,आपको देख कर लगता तो नहीं कि आप सत्तर साल के हो।

उस पर ये एकदम खुश हो कर हँसने लगे और बोले “हाँ यार , आज ही हुआ हूँ। अब तुम इकहत्तर भी नहीं होने दोगे क्या?”

जब पप्पा नौकरी करते थे, तब यदि उनसे मिलने कोई आता और पूछता कि अभ्यंकर साहब कहाँ मिलेंगे

तो जवाब मिलता, “जहाँ से जोर से हँसने की आवाज़ आ रही हो ना बस वहीं चले जाना ।”

उनकी दो साल की पोती भी और कुछ बोलना सीखने से पहले उनके हँसने की नकल करना सीख गई थी।

सुबह सैर पर जाने का उन्हें बेहद शौक है। एक बार वो किसी हास्ययोग क्लब वालों की पकड़ में आ गए थे। 

जब लोगों ने उन्हें बताया कि वे सब हफ्ते में चार दिन सुबह साढ़े छह बजे पार्क में इकट्ठे हो कर २० मिनिट हास्य योग का अभ्यास करते हैं तो पप्पा खूब हँसे। पप्पा ने उन्हें बताया कि मैं तो जिंदगी भर, सारा दिन ही किसी न किसी बात पर हँसता रहता हूँ। मेरा हँसने का कोटा इस तरह १०१५ मिनिट में पूरा नहीं होगा। मुझे तो आप लोग माफ कीजिये । आप अपना हँसने का काम चालू रखिये । 

 बचपन से हमें हमेशा यह बात मालूम थी, कि अपने पापा औरों के पापाओं से अलग हैं। और ये भावना mutual थी।

आई स्कूल में शिक्षिका थी और हमेशा ये उम्मीद रखती थी कि हम कुछ और बेहतर बनें। इसलिये अक्सर वो हमें दूसरे अच्छे बच्चों की बातें बताती। किसी परिचित के बच्चे ने कुछ भी किया, तो हमें उसकी बेहिसाब प्रशंसा सुनना पड़ती। सारी कहानी सुनने के बाद जब हम मुहँ लटकाते तो पप्पा बड़े जोश से कहते “वो सब तो ठीक है यार ,लेकिन अपने बच्चों की तो बात ही कुछ और है।”

कई बार आई इस पर नाराज हो कर बहस लगाने की कोशिश करती और यदि पप्पा के पास कोई सबल दलील ना होती तो वे कहते ” वो सब तो ठीक है यार ,लेकिन अपने बच्चों की तो बात ही कुछ और है। ये अपने हैं।”

कितनी ही ऐसी बातें हैं जो उनके बार-बार दोहराने की वजह से हम तीनों भाई बहनों के दिमाग में हमेशा के लिये घर कर गई है।

“अपन लोग किसी भी बात से ज्यादा देर डर कर नहीं रह सकते। डरते हैं, पर फिर पलट कर खड़े हो ही जाते हैं। भागते नहीं।”

“अपन लोग किसी भी बात पर बहुत देर गुस्सा नहीं रह सकते, थोड़ी देर में हँसी आ ही जाती है।”

“एक दूसरे के लिये बस अपन ही लोग हैं, दूसरा कोई अपनी मदद के लिए नहीं आएगा। अपने को ही जिंदगी भर एक दूसरे का खयाल रखना है।” वगैरह, वगैरह …….

ऐसी बहुत सी बातें है जो उनके अनुसार अपने खून में ही हैं और कुछ बातें ऐसी भी हैं जो अपने खून में ही नहीं है । जिस पर हमें अब भी पूरा विश्वास है।

अपन मतलब हम पांच अभ्यंकर होते। और हम तीनों को इस बात पर कभी शक नहीं हुआ कि दूसरा कोई चाहे कुछ भी करता रहे, लेकिन अपनी तो बात ही और है।

आई ने हमेशा आईना दिखा कर जमीन पर रखा, इसलिये कभी बहुत चने के झाड़ पर चढ़ नहीं पाये,और पप्पा ने पैरों तले की ज़मीन को इतना पुख्ता बना दिया कि हम तीनों ही हर परिस्थिति में  खुद से खुश रहना सीख गये।

 हम रोज शाम को जितने उत्साह से हमारे दिन भर का लेखा जोखा उन्हें सुनाते वैसे ही आई-पप्पा भी उनका दिन कैसा गुजरा ये हमें बताते।

जिस तरह हमारे सब दोस्तों ,शिक्षकों वगैरह से वे परिचित थे, हम भी आई के स्कूल के सारे शिक्षकों, उनके परिवारों और पप्पा के सभी क्लाइंट्स और जजों के बारे में सब जानते थे। उन्होंने दिन भर में किये हुए अच्छे और गलत कामों के बारे में भी हमें सब मालूम होता। यदि कुछ गलत होता तो वह सीधे-सीधे यह भी मान लेते कि गलती हुई, लेकिन इसके सिवा और कोई विकल्प नजर ही नहीं आया, तो क्या करता?

मैं और मनीषा शादी के बाद पुणे आ गये, सुबोध इंदौर चला गया फिर भी हमारे दोस्त उनसे मिलने, उनके यहाँ खाना खाने बेधड़क जाते रहे। सुबोध के दोस्त तो ईमानदारी से आई -पप्पा का खयाल रखते।

आई-पप्पा हमेशा से सिर्फ हमें ही नहीं बहुतों को आधार लगते रहे हैं, और अब भी लगते हैं।

पप्पा बहुत जिद्दी हैं । चाहे खुद गलत हों फिर भी कभी दूसरे की बात नहीं मानते। जब उनके पास कोई ठोस दलील नहीं होती तो कहते हैं

“मेरा तो बस ऐसा ही है, मैं तो एकदम बेकार टाइप का आदमी हूँ, मुझसे मत बात करो।”

शंकर दयाल शर्मा पप्पा के अच्छे परिचित थे, और उनके भांजे भी पप्पा के मुवक्किल थे। वे तब भी बड़ी हस्ती ही थे। एक बार इलेक्शन से पहले वे हमारे घर आए। पप्पा ने उन्हें   चाय-वाय पिलाई और जाते समय बड़े प्यार से उनसे हाथ मिला कर बोले “शर्मा जी ,आप बड़े अच्छे आदमी हैं , लेकिन वोट तो हम बीजेपी को ही देते हैं।”

हम लोगों ने बाद में बड़ा शोर मचाया कि ये बोलने की क्या ज़रूरत थी, वैसे भी मतदान गुप्त ही तो होता है। हाँ कह देते तो क्या फर्क पड़ता। लेकिन पप्पा बोले फर्क पड़ता है।

शर्मा जी को अलबत्ता इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा। शर्मा परिवार बाद में भी हमेशा ही पप्पा के पास आते रहे।

उनका काम करने  का तरीका भी बड़ा अजीब था। शुरू-शुरू में उनका  एक ऑफिस था, पर बाद में वो घर से ही काम करने लगे।

वही अधिक सुविधाजनक था। हम लोग बहुत छोटे थे। आई स्कूल जाती,तो उनका हम पर ध्यान बना रहता। साथ ही काम भी करते रहते।

उनका ऑफिस भी क्या था,हमारे घर का बरामदा था। वहाँ एक सोफा सेट और चार कुर्सियाँ पड़ी रहतीं। बीच में एक बेहद उँचा सेंटर टेबल था। हम लोग चाहते थे कि उसकी टाँगे कटवा कर उसे नॉर्मल साईज का जैसा सब के घरों में होता है, वैसा बनवा लिया जाए, लेकिन ऐसी बातें मान जाएं तो वो पप्पा ही क्या? वे उस टेबल पर ही अपना सारा काम करते। उँचाई की वजह से उन्हें टायपिंग वगैरह में आसानी होती। दो कुर्सियां तो इतनी छोटी थीं, के जब हम एक -दो साल के थे,तब हमारे लिये लाई गईं थीं। पर उन पर भी लोग बैठ जाते। वे भी बिना चूँ किये सब को सह लेतीं।

एक बार एक क्लाईंट बोला

“वकील साहब , ये सोफा एकदम पुराना हो गया है। एक नया बढ़िया सोफा लीजिए।”

“तुम भगवान सिंग गुलाटी को जानते हो ?” पप्पा ने बड़ी शाँती से पूछा।

“हाँ साहब, उन्हें कौन नहीं जानता । बहुत बड़े बिज़नेस मॅन हैं। उनका क्या?”

”  उनके घर एक बहुत बढ़िया सोफा है ।तुम्हें यदि बढ़िया सोफे पर बैठने का शौक है तो उनके घर जा कर बैठो, लेकिन अगर मुझसे काम है तो इसी पुराने सोफे पर बैठ कर बतलाना पड़ेगा।”

सामने वाले बेचारे की  बोलती बंद।

आने जाने वाले हर व्यक्ति को चाय पिलाने का तो हमारे यहाँ मानो सरकारी कानून था। जब भी कोई आता तो उसके लिये चाय बनती। पप्पा तो हमेशा से चाय बाज थे ही और साथ-साथ हम सब भी कट चाय पीने को तैयार होते।

आई के पिता बेहद अनुशासनप्रिय और कड़क स्वभाव के व्यक्ति थे। चाय पीना वे एक बुरी एवं तबीयत के लिये हानिकारक आदत मानते थे, इसलिये आई ने अपनी शादी से पहले कभी चाय चखी भी नहीं थी। पप्पा से शादी के बाद भी कभी उनकी चाय पी कर देखने की ना तो हिम्मत हुई ना इच्छा। लेकिन पप्पा को साथ देने के लिये वो कॉफी पीने लगीं। शायद कॉफी के बारे में उनके पिताजी की कोई राय नहीं थी।

लेकिन आई को दिन में कई कप चाय बनाना पड़ता। आई कहती ” किसी को भी चाय पीओगे क्या?”, यह सवाल पूछने में भी डर लगता है। हर आदमी हाँ ही कहता है।”

सुबह की पहली चाय तो आज भी पप्पा ही बनाते हैं । पप्पा का चाय बनाना भी एक बेहद महत्वपूर्ण काम होता है। उसे lightly नहीं लिया जा सकता। जाने कहाँ-कहाँ से ढूँढ कर वे पत्ती वाली चाय लाते हैं । उसकी ताजमहल या रेडलेबल के साथ ब्लॅन्डिंग की जाती है। उबलती हुई चाय में डायरेक्ट दूध डालना वर्जित ही है। चाय बनकर कप में डलते ही वे सब के नाम से शोर मचाना शुरू कर देते हैं। उसे तुरंत ही पीना पड़ता है। एक बार ठंडी हो चुकी चाय फिर गर्म कर पीना वे चाय का अपमान समझते हैं। इसलिये जो भी चाय पीना चाहता है, उसे हाथ का हर काम छोड़ कर पहले चाय पीना आवश्यक होता है ।  वे खुद तो इतनी अधिक गर्म चाय पीते हैं कि शायद उनके मुँह में एक भी जीवित सेल बाकी नहीं होगी।

बचपन में मुझे लगता था कि वे चाय के प्रति कुछ अधिक ही संवेदनशील हैं और चाहते हैं कि हर व्यक्ति उनकी चाय का सम्मान करे, लेकिन अब समझ में आता है कि वे लोगों के प्रति संवेदनशील हैं और यह उनका तरीका है अपनी आत्मीयता प्रदर्शित करने का।

दिन भर जब उनके क्लाईंट आते तब घर में जो उपस्थित होता वह चाय बना देता।

जब हम में से कोई नहीं होता, तो पप्पा काम छोड़ कर चाय बनाते। लेकिन चाय जरूर पिलाते।

एक बार हम तीनों आई के साथ किसी शादी में ग्वालियर गये थे। पप्पा काम की वजह से नहीं आए थे। जब हम वापस लौटे तो घर की हालत देख कर आई को रोना आ गया। पप्पा ने सारा किचन चाय के झूठे बर्तनों से भर रखा था। और जब कुछ रखने की जगह बाकी ना रही, तो बजाय साफ-सफाई करने के वो रॉकेल का स्टोव और चाय का सामान उठा कर दूसरे कमरे में चले आए थे। आई को गॅस तक पहुँचने भी काफी कष्ट करने पड़े।

कभी-कभी तो मुझे लगता था, कि हमारा घर ही बाहें फैलाए हर आने जाने वाले का स्वागत करता हुआ कहता है “आओ यार चाय पियो।”

उनके एक मित्र अक्सर कहते, कि ये जो तुम्हारा बाप है ना ये इतना गुस्सैल ,सनकी और झक्की है, जो दिल में आता है वो करता है, पता नहीं फिर भी ज़िंदगी में और अपने व्यवसाय में इतना  सफल कैसे है?

आज तक पप्पा अपनी शर्तों पर,अपने तरीके से ही जीते रहें हैं। कोई क्या कहेगा इसकी कभी उन्होंने परवाह नहीं की। ऐसा करने के कभी-कभी उन्हें दुष्परिणाम भी भुगतने पड़े ,तो भी उन्होंने कभी समझौते किये ही नहीं।

इस तरह जीना हर एक को संभव नहीं है।

मैं कई दिनों से उनके पीछे लगी थी कि वे खुद अपनी रामकहानी लिखें।

लेकिन वो हँस कर टाल गये। बोले” यार मैं तो एकदम बेकार टाईप का आदमी हूँ। कुछ तो भी कर करा के जैसे तैसे काम चला लेता हूँ। मेरी क्या biography”

फिर भी जब मैने उनका पीछा नहीं छोड़ा तो कहने लगे “बड़ा मुश्किल है बेटा! मैंने जिंदगी में इतने डंडे-सट्टे (ये उनका खास शब्द है) किये हैं कि मैं सच कभी भी नहीं लिखूंगा।”

आखिर मैंने ही तय किया कि मैं ही लिखती हूँ। वो बाद में गलतियाँ सुधार देंगे। फिर भी कई बातें वो बता तो देते हैं ,पर लिखने से मना करते हैं। मैं यहाँ जो कुछ लिख रही हूँ,यह उनकी जिंदगी का उनका अपना वर्जन है। बहुत सी बातें ऐसी हैं जिन पर मेरी आत्या (बूआ) या और लोगों का नज़रिया अलग है। लेकिन मैं यहाँ कहानी तो पप्पा की लिख रहीं हूँ ना, किसी और की नहीं ।

 

बाकी अगली बार………

 

4 thoughts on “बाप रे बाप…१

Add yours

  1. Swati,
    Loved your first chapter . Quite a personality , your Dad , with his own trade mark idiosyncrasies .
    Your writing style is very lucid and smooth flowing . This biography that you have ventured into is a wonderful tribute to your late father . Keep it up.
    Looking forward to the next chapter .

    Like

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