गमन

 

पप्पा इतने अधिक अस्तित्वमय थे,इतने अधिक ज़िंदा थे कि जाने के बाद भी बहुत सारे रह गये।

पहली बार जब उनके कॅन्सर के बार में पता चला, तब से ले कर उनके जाने तक अलग-अलग समय पर अलग-अलग मन:स्थितियों में ये चार कविताएँ लिखीं थी। पहली तब, जब उनका जाना तय है, ये पता चला। दूसरी, जब उनकी तकलीफ देखना भी मुश्किल लगने लगा। तीसरी उनकी मुक्ति पर और चौथी उनके गमन के बाद जब शांति से उनकी इस परम यात्रा के बारे में सोचा।

 

               1.

बहुत तेज़ चलते थे तुम,

नामुमकिन सा लगता था

कदमों से कदम मिलाना।

 

अक्सर दौड़ कर पार करती

मैं हमारे बीच का अंतर

दो पल सांस भर लेती,

कि तुम जा चुके होते

बहुत आगे

कहीं के कहीं,

उतनी सी देर में।

 

मैं चिल्लाती,

जल्दी क्या है इतनी

रुको ना मेरे लिए भी,

तुम हँस कर कहते,

“इतना वक्त है क्या मेरे पास ?

सैकड़ों काम हैं निबटाने मुझे।

आती रह तू आराम से पीछे,

अपनी ही रफ्तार से।”

 

आज जब तुम्हें देखती हूँ

तो मुझे वह दुबला, थका सा,

हर साँस के लिए लढ़ता

शख्स दिखता ही नहीं।

मुझे तो वही तुम दिखते हो,

सधे हुए कदमों से,

झपाझप आगे-आगे जाते।

और मैं पीछे दूर

कहीं से चिल्लाती हूँ

पप्पा थोड़ा तो रुको ना…

                       02/04/2015

             2.

हमेशा उन्हें खुद से

पहले जगा हुआ पाया।

जाने कब दिन खत्म होता उनका

और जाने कब शुरू भी हो जाता।

वो कभी सोते ही नहीं थे शायद…

 

रात अक्सर पढते-पढते आँख लगती,

लेकिन सुबह हमेशा तन पर रजाई

और कमरे की बत्ती बुझी मिलती।

वो कभी सोते ही नहीं थे शायद…

 

दिन भर के थके मांदे कभी इस

तो कभी उस कुर्सी पर बैठे ऊँघते,

झपकी लगती, और वहीं

बैठे-बैठे गर्दन लटका देते।

 

खुट की आवाज से जागने वाले वे

आराम से बिस्तर पर पीठ

टिकाते कभी देखा नहीं उन्हें

वो कभी सोते ही नहीं थे शायद…

 

और वो जाग रहे हैं,

वो हैं, इस अहसास की

गरमाहट मे लिपटे हम,

बेपरवाह, निश्चिंत सोते  रहे।

 

जाने कब से चलता रहा है

ये सिलसिला…….

लेकिन अब कहती हूँ

जाने कब से जाग रहे हो

पप्पा बस अब सो जाओ।

 

हर इम्तिहान से गुजर चुके,

सबकी खातिर बहुत कर चुके।

जाने कब से जाग रहे हो

पप्पा बस अब सो जाओ।

 

करने की सीमा होती है

थकने की सीमा होती है।

जाने कब के जाग रहे हो

पप्पा बस अब सो जाओ।

                         17/04/2015

                       3.

कोई क्षणिक दुर्घटना नहीं था
उनका जाना…

धीरे धीरे इस तरह विलीन
होते रहे वो
जैसे..
चीनी की डली अपनी
मिठास के साथ
शरबत में घुल जाए।

जैसे…
दिन भर का थका सूरज
आसमान को अपनी
लालिमा से रंग कर
अस्तांचल में पिघल जाए।

जैसे..
किसी मधुर गीत की
स्वरलहरियाँ
सराबोर कर वातावरण को
हवा में घुल जाएँ।

इसी तरह विलीन होते रहे वो
और समाते रहे उनके
रंग, खुशमिज़ाजी और गीत
हममें, कि वो,अब वो रहे ही नहीं

किसी एहसास की तरह
समा गया है उनका अस्तित्व
हम सबमें…

अब भले ही उनका थका
बीमार शरीर हम सौंप
चुके हैं पंच तत्वों को
लेकिन,हमारे पप्पा अब
पहले से भी अधिक हैं
हमारे साथ कि, अब
वे हमारा ही हिस्सा हैं
और हम उनका।

अब भी गूंजते हैं
उनके ठहाके घर में,
और उनके साथ ही
मनाते है हम
मुक्ति पर्व उनका।

30/04/2015

              4.

उम्र के हर पड़ाव पर

ज़िंदगी से हर रंग में

मुलाकात होती रही मगर,

पहली बार मौत को

इतने करीब से देखा।

किसी लंबे सफर के बाद,

ज्यों घर को वापसी हो।

इतनी शांत,इतनी चिरस्थायी

इतनी अम्लान मुस्कान

कभी देखी नहीं थी।

गर आखरी पड़ाव यह है,

तो अब मुझे ज़िंदगी से

डर नहीं लगता।

6/5/2015

 

 

 

 

 

 

 

One thought on “गमन

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  1. केवळ अप्रतिम. वाचून डोळ्यात पाणी आले. खूप हृदयस्पर्शी

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