रोने से औेर….

रोने से और……..

 

 

बहुत दिनों के बाद सुबह सुबह सैर करने निकली। ठण्ड की वजह से रास्तों पर भीड़ कम थी। पार्क के सामने से गुज़र रही थी तो जोर ज़ोर से हा हा ही ही हो हो की आवाजें सुनाई दीं। कुछ देर रुक कर देखा । बहुत से अधेड़ उम्र के आदमी और औरतें मन लगा कर,प्रयत्नपूर्वक चीख चीख कर हंस रहे थे।
पापा की याद आई । वो एक दिन किसी हास्य-योग क्लब वालों की पकड़ में आ गए थे।
जब लोगों ने उन्हें बताया ,कि वे सब हफ्ते में चार दिन सुबह साढ़े छह बजे पार्क में इक्कठे हो कर २० मिनिट हास्य योग का अभ्यास करते हैं, तो पापा खूब हँसे।

पापा ने उन्हें बताया, कि मैं तो जिंदगी भर सारा दिन ही किसी न किसी बात पर हँसता रहता हूँ। मेरा हँसने का कोटा इस तरह १०-१५ मिनिट में पूरा नहीं होगा। मुझे तो आप लोग माफ़ कीजिये । आप अपना हँसने का काम चालू रखिये ।

मुझे भी इन हास्य योग क्लब वालों को देख कर हैरत होती है।

क्या सचमुच इस तरह घडी लगा कर हँसने से सुकून मिलता होगा?
खुशवंत सिंह ने लिखा है, कि यदि इस तरह हँसने से राहत मिलती है, तो रोने से और भी अधिक राहत मिलेगी।
ख्याल आया, कि जिस तरह ये हास्य योग क्लब हैं, वैसे ही यदि रुदन क्लब बनाए जाएँ तो कैसा हो?
यदि सचमुच कहीं इस तरह रोने कि गुंजाईश हो, जहाँ सभी रो रहें हैं, और आपको किसी को भी अपने रोने कि वजह बताने कि ज़रूरत नहीं हो ,तो इन्सान बेझिझक रो लेगा।
बचपन से ले कर बुढ़ापे तक कितने अवसर आते हैं ज़िन्दगी में ,जब देखा जाए तो रोने कि भरपूर गुंजाईश होती है.लेकिन कितना काम रोते हैं हम । जबकि रोना तो इन्सान कि पहली अभिव्यक्ति है।

भावनाओं को दबाने कि इतनी आदत हो जाती है कि अक्सर तो रोने का ख्याल भी नहीं आता।
जब सब मिल कर रोने बैठेंगे तो शायद किसी बाहरी मोटिवेशन की जरूरत ही न पड़े। हर आदमी अपने ही किसी दुःख से रो लेगा।
एक जरा सी जिंदगी में लाखों गम,अपमान, नाउम्मिदियाँ ,कडवाहट, नाकामियां ऐसी होंगी कि जिनके लिए हर एक पर अलग से रोया जा सके।
हम औरतें तो फिर भी कभी ना कभी दो चार आंसू इधर उधर गिरा कर मन हल्का कर लेती हैं। लेकिन पुरुषों पर तो मुझे तरस ही आता है। मै अपने बेटों को देखती हूँ तो लगता है जाने कैसे ,कहाँ से इतनी जल्दी सिख गए ये ,कि मर्द को दर्द नहीं होता। अभी कल तक तो दहाड़े मार कर रोया करते थे।
छुपाया हुआ , ना बहाया हुआ एक एक आंसू विष की तरह घुलता होगा बदन में। स्कूल में बिना गलती के मिली सजा का अपमान याद रहता है जिंदगी भर। बचपन में माँ ने छोटे भाई की बाजु ले कर किया अन्याय तक नहीं भूलता।

इतनी छोटी छोटी बातें भी सलती रहतीं हैं। जब याद आने लगती हैं तो सिलसिला ही शुरू हो जाता है। फिर दुनियां के दिए जख्मों का क्या?
जख्म कैसा भी हो छोटा या बड़ा भरता कभी नहीं।बस जरा कुरेदा कि हरा हो गया।
तो यदि कभी मौका मिल जाये जोर से चीख चीख कर विलाप करने का, तो हर कोई अपने ही लिए रो लेगा।
कौन रोता है किसी और की खातिर ए दोस्त
सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया
कभी खुद पे, कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हर एक बात पे रोना आया।
और जब एक बार जी भर के रो लेंगे .ढेर से आंसू बहा लेंगे तो शायद सचमुच ही हमारे मन को शांति मिले। मन की सब कडवाहट ,सारा ज़हर आंसू बन कर बदन से बाहर निकलेगा, तो क्या इस भागती दौडती दुनियां से थके हुए, मुरझाए हुए मनों को कुछ राहत मिलेगी?
ग़ालिब कह ही गये हैं :
रोने से और इश्क में बेबाक हो गए,
धोए गये कुछ ऐसे के बस पाक हो गए।

 स्वाती

 

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