पोरटेज

                          पोरटेज

 

बहुत साल पहले, भोपाल की गॅस त्रासदी के समय सबसे पहली बार यह विचार मन में आया था।

आधी रात को जब किसी को कुछ भी पता नहीं था, कि क्या हुआ, अचानक भगदड़ मच गई। लोग खाँसने लगे, बंद कमरों में दम घुटने लगा। दिसंबर की जानलेवा ठंडी रात में लोग घर से निकल कर भागने लगे। ये किसी की भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर किस चीज़ से बच कर भाग रहे हैं, और घर से भाग कर जाएंगे कहाँ, लेकिन लोग भाग रहे थे। ठंड के दिनों में तन पर पूरे कपड़े हैं, या नहीं ये देखने तक का ना तो वक्त था, ना ही सुध थी। उस समय सिर्फ एक ही चीज़ कीमती थी , वह थी जान। जान को खतरा लगा, इसलिये भाग रहे थे।

जब सारा महौल ठंडा और पुराना हुआ, तो हर कोई आपबीती बताने लगा।

सबसे पहले अधिकतर लोगों को खयाल आया था, तो सिर्फ अपने बच्चों का। और कुछ सोचने समझने का अवसर ही नहीं था। अधिकांश लोगों ने घर से सिर्फ सोते हुए बच्चों को उठाया था।

ज़रा चैन की साँस ले ही रहे थे, कि फिर अफवाह उठी। मिथाइल आइसो सायनाइड की एक बड़ी टंकी खाली करते समय फिर गॅस रिसने लगी है। तब तक तो पहले हादसे में मरे हजारों लोगों के शवों का अंतिम संस्कार भी नहीं हो पाया था। डर बहुत ज्यादा था।

लेकिन इस बार फर्क था। फर्क यह था, कि अब शत्रु अज्ञात नहीं था। लोग जानते थे कि खतरा क्या है। और इस बार दोपहर थी, अंधेरी रात नहीं थी। हालांकि समय बहुत कम था,लेकिन लोगों ने अपनी जरूरत का सामान ,पैसे ,जेवर आदि इकट्ठा कर गाड़ियों में भरे। कुछ ने खाने का सामान भरा। कुछ समझदार लोगों ने पहले ही पेट्रोल के पीपे तक गाड़ी में भर रखे थे।

बाद में जब यह घटना भी किस्सा बन गई, तब एक ऐसे ही समझदार पड़ौसी ने बताया था कि यदि आप अपना घर ,शहर वगैरह छोड़ कर दूसरी जगह जा कर भी पहले की तरह काम करना चाहते हैं, और इज्ज़त से जीना चाहते हैं, तो सबसे ज़रूरी चीज़ आपकी पहचान है। और आपकी पहचान सिर्फ आपके सारे सर्टिफिकिटस् हैं। वही आपके ‘आप’ होने का सबूत हैं। आपके या किसी और के शब्दों की कोई कीमत नहीं है।

इसलिए जब घर छोडने की नौबत आई तो उन्होंने सबसे पहले सारे महत्वपूर्ण कागजात, जिसमें घर,बँक आदि के दस्तावेज भी थे, साथ लिये थे।

तब मेरी उम्र कोई बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन उनकी बात बड़ी महत्वपूर्ण लगी थी।

इस तरह के हादसों के बाद दिमाग का कुछ ऐसा प्रशिक्षण हो जाता है, कि कहीं किसी कोने में हमेशा दिमाग उस तरह के हादसे से निबटने के लिये खुद को तैयार ही रखता है। कभी फिर ज़िंदगी में मुझ पर ऐसा मौका आए, तो शायद मेरे मन में पहला खयाल वही होगा ।

 

हम सबको बचपन से हज़ारों बार अलग अलग तरीकों से ये समझाया जा चुका है, कि हम खाली हाथ आए थे, और खाली हाथ ही इस दुनियाँ से वापस जाएँगे।

लेकिन सफर सिर्फ इस दुनियाँ से उस दुनियाँ का ही नहीं होता। वह तो अंतिम प्रवास है। उसके पहले असंख्य छोटे-बड़े सफर चलते ही रहते हैं।

हमने युरोप का सफर कुछ दोस्तों के साथ कार से किया था। पाँच देश घूमें और तंबुओं में रहे। पाँच लोग और उनका महीने भर का सारा सामान यदि एक गाड़ी में रहना हो, और रोज वो सामान उठा कर अगले पड़ाव पर जाना हो, तो हर एक को अपना सामान बड़ी सावधानी और किफायत से चुनना होता है। लेकिन इस सफर में भी लौट कर वापस आना ही था।

मेरे जैसे लोग जिन्होंने भारत में बहुत ट्रेन प्रवास किया हो, और गॅस त्रासदी भी देखी हो, उनका दिमाग हमेशा इस बात के लिए तैयार रहता है, कि यदि हादसा होने की कण मात्र भी संभावना है, तो वह अवश्य हो सकता है। ज़रूरत हो या ना हो मैं आदतन किसी भी प्रवास के समय ज़रूरत से अधिक खाने का सामान साथ रखती हूँ। मेरे लिये वह कागज़ों (पासपोर्ट, टिकिट, क्रडिट कार्ड) के बाद सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है।

लेकिन अभी हाल ही में एक किताब पढ़ी। उसमें कुछ वाक्य जैसे दिमाग की घंटी बजा गये।वह खयाल जो हमेंशा से दिमाग में कहीं घर किए बैठा था, फिर सामने आ गया।

बनी मॅकब्राइड नामक लेखिका ने अपनी पुस्तक ‘The women of Dawn’  में वाबानाकी इंडियनस् के बारे में लिखा हैं। पोरटेजिंग के बारे में वे लिखती हैं कि “यह वाबानाकियों के जीने का तरीका है। वे कभी किसी जगह स्थाई घर बना कर, या एक जगह टिक कर नहीं रहते। अमेरिकन इंडियनस् के एक नदी से दूसरी नदी में जाने को पोरटेज कहा जाता है। इस तरह पोरटेज करते समय, उन्हे अपनी छोटी सी नाव सकट ज़रूरत का सारा सामान साथ सर पर रख कर ले जाना होता है। कम वजन या बोझ के साथ सफर करने के फायदे हर कोई जानता है, और यह भी सब जानते हैं कि इसका मतलब है, बहुत कुछ पीछे छोड़ कर जाना। और इंसान के सर पर सबसे अधिक वज़नदार बोझ, जो राह में रोड़े अड़काता है, वह डर का होता है। आमतौर पर यही बोझ उतार फेंकना सबसे मुश्किल होता है।”

मैने ’ऑरफन ट्रेन’ नामक एक किताब पढ़ी, उसमें इस बात का उल्लेख था। उस पुस्तक में एक समाजशास्त्र के शिक्षक रेड इंडियनस् का इतिहास पढ़ाते समय अपने विद्यार्थियों को ‘बनी मॅकब्राइड’ और उनकी इस पुस्तक के बारे में बताते हैं और ‘पोरटेज’ पर एक प्रॉजेक्ट करने के लिए प्रेरित करते हैं।

अब पोरटेज के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिये पुराने समय के वाबानाकी इंडियन खोजना तो मुश्किल है, इसलिये वे सुझाव देते हैं कि इस प्रॉजेक्ट को सांकेतिक रूप से किया जाए। विद्यार्थी अपने परिचय के कुछ बड़ी उम्र के लोगों के इंटरव्यू लें और उनसे ये तीन सवाल पूछें –

  1. यदि उन्हें किसी ऐसे सफर पर जाना पड़े, जहाँ सिर्फ महत्वपुर्ण वस्तुएँ ही ले जाना संभव है तो वे क्या चुनेंगे?
  2. वे पीछे क्या छोड़ जाएँगे?
  3. क्या महत्वपूर्ण है इसका निर्णय कैसे किया। वह क्यों महत्वपूर्ण हैं?

 

इस बात ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया।

इन सवालों को यदि सांकेतिक रूप से ही देखा जाए, तो इसका विस्तार कितना बढ़ जाता है।

गडबड़ी में जान बचाने के लिए जीवनावश्यक वस्तुएँ ले कर घर से बाहर भागना कितना आसान लगने लगता है। तब आप के पास बहुत कुछ सोचने समझने का अवसर ही नहीं होता। सिर्फ उस क्षण का वह निर्णय होता है। उस पर बाद में फुर्सत से अफसोस भी मनाया जा सकता है

लेकिन सोच समझ कर यदि आवश्यक नहीं, वरन महत्वपूर्ण वस्तुएँ साथ लेनी हो, और फिर पलट कर कभी इस राह वापस आना न होगा, ये मालूम हो, तो क्या पीछे छोड़ना है, इसका निर्णय भी कितना मुश्किल और जानलेवा हो सकता है। तब जबकि मुझे मालूम हो, कि ना तो मैं दुनियाँ छोड़ कर जा रही हूँ, ना ही सन्यास ले कर सब कुछ त्याग रही हूँ। मैं तो बस जीवन के प्रवाह में अगले पड़ाव की तरफ बढ़ रही हूँ। और इसके बाद भी मुझे अभी बाकायदा जीना है।

एक विस्तृत परिपेक्ष्य में जब मैं इस बारे में सोचने लगी तो मेरे मन में प्रमाणपत्रों, प्रशंसापत्रों, कपड़े-लत्तों, खाद्यपदार्थों, क्रेडिटकार्ड, मोबाइल आदि चीज़ें जो मुझे जीवनावश्यक लगती रहीं हैं, उनका खयाल भी नहीं आया। आश्चर्य है, कि ये बातें, अन्यथा जिनके बिना मेरे दिन का एक पत्ता भी नहीं हिलता, मुझे ले जाने लायक तो क्या, छोड़ जाने के लायक भी नहीं लगीं ।

मेरे पास यदि विचार करने का समय हो,और चुनाव की आज़ादी हो, तो मेरे दिमागी कोलाहल को सुलझा कर दो ढेर लगाना आसान होगा क्या?

ये रहा साथ ले जाने वाले सपनों का ढेर, ये अपूर्ण, टूटे-फूटे, पुराने वालों का…

ये नये–पुराने, सदैव ताज़े, खूबसूरत, दिल का मामला वाले रिश्तों का ढेर, तो ये जंग लगे,                     धूल सने,यूँ ही किसी संभावनाहीन कोने में पड़े, फिर भी दिल का मामला वाले रिश्तों का ढेर…

ये वो सब मेरी ही आदतें, हरकतें जो मुझे ‘मै’ बनाती हैं, और ये वो सब मेरी ही आदतें, हरकतें जिनसे दुसरे ही नहीं, मैं खुद भी तंग हूँ ,पर जो फिर भी मेरे अस्तित्व का हिस्सा हैं।

ये खुद ने चुनी जिम्मेदारियों का बोझ, ये दूसरों ने लादी हुई जिम्मदारियों का बोझ….

ये सही निर्णय और उनके साथ मिली सफलता,प्रशंसा,समाधान का ढेर, तो वो गलत निर्णय और उनके साथ हमेशा के लिए चिपकी निर्भत्सना, अपमान, सबक और अनुभवों का ढेर…

ये वाली यादें, वो वाली यादें…  इनके तो दो ढेर हो ही नहीं सकते ।उनके बिना तो मैं मैं ही नहीं हूँ।

सच में, सोचने समझने के समय, और चुनाव की आजादी का आभाव जीवन कितना आसान कर देता है। तब कितनी बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त होते हैं हम। अपने स्वयं के निर्णयों का बोझ ज्यादा भारी होता है, क्योंकि वह सारा का सारा खुद ही उठाना पड़ता है। किसी और के मत्थे नहीं मढ़ा जा सकता।

बनी मॅकब्राइड ने लिखा है कि सबसे बड़ा बोझ डर का होता है। यह भी कितना सच है।

कितने प्रकार के डर हमें ना जाने कितनी बातों से बाँधे रखते हैं। जैसे कल शायद नल में पानी ना आए, ये डर हमें एक बाल्टी पानी अधिक भर कर रखने को मजबूर करता है, उसी तरह शायद किसी को बुरा लग जाएगा ये डर, ये खयाल ना जाने कितने अप्रिय संबंधों को ढोने के लिये मजबूर करता है।

कल का डर तो सबसे बड़ा बोझ है।

शेख फरीद की कहानी याद आती है। बाज़ार में घूमते समय उन्हें एक आदमी गाय के गले में रस्सी बांध कर जाता हुआ नज़र आया। शेख ने शिष्यों से पूछा कि कौन किससे बंधा है ? गाय आदमी से, या आदमी गाय से। शिष्यों ने जवाब दिया कि ज़ाहिर है फंदा गाय के गले में है और रस्सी आदमी के हाथ में , तो गाय ही आदमी से बंधी है।

शेख बोले “ यदि फंदा काट दिया जाए तो गाय आदमी के पीछे दौड़ेगी, या आदमी गाय के पीछे?”

डर को पीछे छोड़ने के बजाय, डर का पीछा छोड़ना ही नामुमकिन है।

सिर्फ बड़ी उम्र के लोगों से ही ये सवाल क्यों पूछे जाएं ?

इस बात का जवाब मेरे छोटे बेटे ने बिना एक क्षण भी सोचे दे दिया। जब मैने  उससे वे तीन सवाल पूछे, कि वो क्या महत्वपूर्ण साथ ले जाएगा, क्या छोड़ेगा और जो महत्वपूर्ण है वो क्यों है तो उसने कहा “सबसे पहले वो माँ को साथ लेगा, बाकी किसी चीज़ की अभी उसे ज़रूरत नहीं। माँ के साथ होने से रोजमर्रा के जीने का प्रश्न अपने आप हल हो जाएगा। माँ सब देख लेगी। बाकी सब तो…..   जो होगा देखा जाएगा।

ये अभी कितना छोटा बच्चा है, मैने सोचा। इसे इन सवालों से कोई सारोकार ही नहीं है। अभी तो इसका बोझ भी माँ-बाप ही उ

ठा रहे हैं।

एक बार पहले भी उसने मुझे इस तरह निरुत्तर किया था। परीक्षा से कुछ दिन पहले भी मुझे जब वह पढ़ता नजर नहीं आया, तब मैने उसे डाँट कर कहा कि सिर्फ अठारह दिन बाकी हैं परीक्षा में, अब तो चिंता करना शुरू करो। इस पर उसका जवाब था कि, आपकी उम्र सैंतालिस है इसलिए अठारह दिन बहुत कम लगते हैं, लेकिन जिसकी उम्र ही सत्रह हो उसके हिसाब से तो अऽ ठाऽ रऽ ह बहुत अधिक हैं, ये सब कम ,ज्यादा तो सापेक्ष है।“

मैं भी सहमत हो गई। ये बीते हुए समय का ही बोझ होता है, जिसके तले हम दबे जाते हैं।

तो मैं फिलहाल इन्हीं सवालों की उलझन में फँसी हूँ। समेटने के चक्कर में मैने इतना कुछ फैला दिया है, कि अब मैं अपनी उम्र के सारे सालों के पहाड़ पर बैठी, यहाँ का कुछ उस ढेर में, और वहाँ का कुछ इस ढेर में कर रही हूँ।

 

 

अभी क्षितिज पर कुछ कुछ लाली-

जब तक रात न घिरती काली,
उठ अपना सामान बटोर।

 

जाल समेटा करने में भी
वक़्त लगा करता है, माँझी,
मोह मछलियों का अब छोड़।

मेरे भी कुछ कागद-पत्रे,
इधर- उधर हैं फैले-बिखरे

गीतों की कुछ टूटी कड़ियाँ,
कविताओं की आधी सतरें,
मैं भी रख दूँ सबको जोड़।’’

 

बच्चन जी की ये पंक्तियाँ हालंकि हमेशा ही याद आती हैं, लेकिन इस उधेड़बुन में अभी तो ना जाने कितना वक्त जाएगा।

 स्वाती

                                                       

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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