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जेरूसलम डायरी 2

जेरूसलम डायरी २ यहाँ जेरूसलम की पश्चिमी दीवार के सहारे दुख से विलाप करते लोगों को देख कर ये खयाल आता है कि हर देश के हर शहर में कोई एक जगह ऐसी ज़रूर होनी चाहिए जहाँ खुलेआम,खुल कर रो सकें लोग। जब बसाए जाते हैं शहर,गाँव,कस्बे तो विचार किया जाता है बगीचों, सिनेमा, नाट्यघरों... Continue Reading →

जेरूसलम डायरी

जेरूसलम की संकरी गली में सामानों और लोगों से ठसाठस भरे बाज़ार के बीच एक मोड़ पर रुक कर उसने उँगली दिखाई। यहीं, इसी जगह पर गिरा था मसीहा। बोझ जब हद से अधिक बढ़ गया, ज़ख्म रिसने लगे, पैर लडखडाने लगे। यहीं, इसी जगह गिरा था मसीहा। दुकानदारों और खरीददारों की भीड़ में रौशनियों... Continue Reading →

क्या क्या मैं कहाँ रख लूँ..

सीने की अतरदानी में जंगल की महक रख लूँ गीली सी हवा रख लूँ अलसाई किरन रख लूँ झरनों के गीतों को झुमकों की तरह पहनूं कानों में झीलों की अल्हड़ सी खनक रख लूँ पलकों में छुपा लूं मैं इस धुंध की तस्वीरें कोहरे की जुल्फों को सुलझाती किरन रख लूँ। फिर लौट के... Continue Reading →

रे मन, कितने मिडिल क्लास हो तुम!

रे मन,कितने मिडिल क्लास हो तुम! क्या कभी खुले दिल से बेधड़क, बेहिचक खुल कर, कोई भावना खर्च कर पाए हो तुम? प्यार हो,नफरत हो या चाहे क्रोध हो, हर बार पड़ जाते हो जमा-खर्च के चक्कर में। किसे बुरा लगेगा,किसे अच्छा, कौन रिश्ता बनेगा,क्या टूटेगा और किस में पड़ेंगी दरारें.. यहां तक कि तुमसे... Continue Reading →

यूँ भी तो हो सकता है…

यूं भी तो हो सकता है उसने कहा कुछ और हो... यूं भी तो हो सकता है वो ना काबिल ए गौर हो। यूं भी तो हो सकता है वो मुझसे खफा न हो... यूं भी तो सकता है ये अगली दफा न हो। ऐसी बातें सोच सोच कर सारी रात बिता दी... ये वो, ये वो करते-करते नाहक... Continue Reading →

तुम्हारे पास क्या है स्वाती?

तैरती हो? नहीं दौड़ती हो ? नहीं गाड़ी चलाती हो? नहीं पहाड़ चढ़ती हो? नहीं गाती हो? नहीं बजाती हो? नहीं पैसे कमाती हो? नहीं तुम आखिर करती क्या हो स्वाती? मेरे पास अपना नाम है,  काम है, पैसा है तुम्हारे पास क्या है स्वाती? उसने पूछा। और लगभग शशि कपूर वाले अंदाज़ में मैंने... Continue Reading →

विरासत

क्या करते जो पापा होते क्या कहते जो पापा होते ये ख्याल आ ही जाता है  बरबस मन में।  या रहता है वहीं  और सर उठा कर  आँख मिलाता है.. जब मैं  अपने बच्चों से कहती हूँ कि बेटा पैसा खर्च करने और  बरबाद करने में फ़र्क होता है। या जब मैं किसी बात से... Continue Reading →

ह्रदय की बात हो

आहटों के शहर में सन्नाटे सारे खो गए। इतनी आवाजें हुईं कि  मौन सारे सो गए। शोर गुल इतना बढा कि कुछ न फिर बाकी रहा। होठ बस हिलते रहे, शब्द बस झरते रहे, कोलाहल गूँजा किए,  और अर्थ सारे खो गए। बात करने की ज़रूरत अब है पहले से अधिक नारे बाज़ी, घोषणाएं शोर शराबा चिल्लपों.. तुमुल... Continue Reading →

कितनी बार

कह रहे हैं किसलिए, लिखना है किस की खातिरदास्तां अपनी ही अपने को सुनाई फिर फिर ।दूसरे तो एक बहाना थे महज़लिख के अपनी बात खुद को ही बताई फिर फिर।कितने झगड़े खुद से हर इक बात परखुद की खुद से दिलजमाई फिर फिर।एक दो चोटों से कब आई समझठोकरें उसी पत्थर से खाईं फिर... Continue Reading →

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