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कुछ लम्हें गैरज़रूरी से

कुछ लम्हें गै़रज़रुरी से, जाने क्यों हो के बेक़रार यादों की एक पीली सी संदूक से हो गए फरार। कुछ गै़रज़रुरी से लम्हें फिर एक सलीके से चलते जीवन में सेंध लगाने लगे... सोची समझी सी राहों में पैरो के नीचे आने लगे। कुछ गैर ज़रूरी सी बातें, फिर फिर से याद दिलाने लगे। पहले ही गैर ज़रूरी थे,जाने... Continue Reading →

क़तरा क़तरा

जाने कैसा पिघल रहा दिल  घुलता है क़तरा क़तरा  वक़्त ए रुख़सत उलझ गया फिर अब भी समझे ना ख़तरा। सपनों को तो समझ नहीं है  मदहोशी सा आलम है  दीवारों पर धूप है लेकिन  आंगन में चंदा उतरा। कितनी बातें कितने किस्से कहना सुनना बाकी है। लेकिन हर एक पल पर जैसे लगा हुआ... Continue Reading →

दो बूँदें शबनम की

कुछ मौसम बड़ा सुहाना था मद्धम मद्धम थी हवा अभी सूरज भी ऊपर आना था है जाना, था मालूम मगर कुछ देर सही, कुछ देर यहीं  बस पल दो पल को ठहर गईं दो बूँदे शबनम की...

मेरा मैं

मेरा मैं था बहुत अकेला खोज रहा था तुझको। जो तू मिलता,दे देना था अपना मैं ही तुझको। बहुत ढूँढ जब तुझको पाया पाया तुझे अकेला ही। तू भी तुझसे भरा हुआ था मेरे लिए जगह ना थी। मैं भी तुझको रखूँ कहाँ कह मैं तो मैं से हूँ लबरेज़। मेरा मैं अब तुझे अकेला... Continue Reading →

नादानी

रोज की मानिंद आसमान में निकला सूरज। रोज की तरह चहकते पंछी चुगने को  चले। रोज की तरह चलती रही इठला के हवा। और तो और बरसने लगी बेमौसम बारिश। कुछ नहीं.. कुछ भी तो पल भर ना थमा... और वो नस्ल कि जिसे पीसना पड़ता है  सदा,खाने के पहले गेहूं का एक दाना भी समझती रही कि... Continue Reading →

मैनें देखा ही नहीं

मेरी खिड़की से बाहर जहाँ तक नजर जाती है दिखती हैं बस इमारतें खिड़कियाँ, और दरवाजे पानी की टंकियाँ और एंटिने इस तरह स्पर्धा करते से, लगता हैं मानों किसी  भीड़ भरे प्लेटफार्म पर गाड़ी पकड़ने एक दूसरे से धक्कामुक्की करते लोग हों। जब भी बाहर देखती हूँ तो  थोड़ा सा सिकुड़ा सा आसमान देख... Continue Reading →

भूलभुलैया

जैसे ज़ीना चढ़ते चढ़ते बीच की सीढ़ी हो जाए गुम, जैसे कुछ भूला ना हो,पर याद आए सब थोड़ा कम। रोज का रस्ता हो कर भी जब कुछ ना लगे पहचाना सा, अपना ही चेहरा दर्पण में लगे बड़ा अनजाना सा। चेहरा जो आंखो के आगे, उस चेहरे को नाम ना हो, और जुबां पर... Continue Reading →

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