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तट पर भी हैं तूफान बहुत

जब रुकना होगा सोचेंगे इंतजार में हैं अरमान बहुत। है अभी तो कश्ती लहरों पर है हम में अब भी जान बहुत। भंवरों से हम कब डरा किए उलझाता है इत्मीनान बहुत। तुम साहिल का नाम ना लो तट पर भी हैं तूफान बहुत। है कार-ए-जहाँ दराज़ अभी ठुकराए हैं फरमान बहुत। ना खुदा, नाखुदा कोई... Continue Reading →

नकाब

पहले ही आसान नहीं था दुनियाँ के हालात समझना चेहरों पर चेहरे पहने लोगों के दिल की बात समझना। असली-नकली चेहरों का हम कर ना पाते थे हिसाब, और कयामत उस पर के अब पहन लिए सबने नकाब। देख हर इक चेहरा पहचाना, मुस्कुराने से मिली निजात लेकिन उलझन और बढ़ी है, समझ ना आए आधी बात।... Continue Reading →

सुनो…

कम बोलो, उसने कहा। ये भी क्या कि बेवजह  इतने शब्द खर्च किए जाओ  जैसे मुफ्त का माल हों। किसी दिन मौन भी रहो कुछ भी,बिल्कुल कुछ भी ना कहो। आखिर साढे तीन सौ शब्दों का  एक दिन भर का कोटा तय हुआ। फिर हूँ या हाँ को एक शब्द माना जाए , या नहीं, इस पर... Continue Reading →

लगभग ईश्वर की तरह

लगभग ईश्वर की तरह ही लगा उसे जब उसने अपने भरे-पूरे  संसार पर नज़र डाली। बड़ा सृजनशील रहा जीवन। कुछ नहीं से शुरू कर  क्या नहीं तक.... अब तो उसकी रचनाएंँ भी अपनी  खुद की सृष्टि के निर्माण में लगी हैं। उसके इस सारे स्व कर्तृत्व से स्वनिर्मित विश्व के बीच लगभग ईश्वर की ही तरह लगा... Continue Reading →

कुछ लम्हें गैरज़रूरी से

कुछ लम्हें गै़रज़रुरी से, जाने क्यों हो के बेक़रार यादों की एक पीली सी संदूक से हो गए फरार। कुछ गै़रज़रुरी से लम्हें फिर एक सलीके से चलते जीवन में सेंध लगाने लगे... सोची समझी सी राहों में पैरो के नीचे आने लगे। कुछ गैर ज़रूरी सी बातें, फिर फिर से याद दिलाने लगे। पहले ही गैर ज़रूरी थे,जाने... Continue Reading →

क़तरा क़तरा

जाने कैसा पिघल रहा दिल  घुलता है क़तरा क़तरा  वक़्त ए रुख़सत उलझ गया फिर अब भी समझे ना ख़तरा। सपनों को तो समझ नहीं है  मदहोशी सा आलम है  दीवारों पर धूप है लेकिन  आंगन में चंदा उतरा। कितनी बातें कितने किस्से कहना सुनना बाकी है। लेकिन हर एक पल पर जैसे लगा हुआ... Continue Reading →

दो बूँदें शबनम की

कुछ मौसम बड़ा सुहाना था मद्धम मद्धम थी हवा अभी सूरज भी ऊपर आना था है जाना, था मालूम मगर कुछ देर सही, कुछ देर यहीं  बस पल दो पल को ठहर गईं दो बूँदे शबनम की...

मेरा मैं

मेरा मैं था बहुत अकेला खोज रहा था तुझको। जो तू मिलता,दे देना था अपना मैं ही तुझको। बहुत ढूँढ जब तुझको पाया पाया तुझे अकेला ही। तू भी तुझसे भरा हुआ था मेरे लिए जगह ना थी। मैं भी तुझको रखूँ कहाँ कह मैं तो मैं से हूँ लबरेज़। मेरा मैं अब तुझे अकेला... Continue Reading →

नादानी

रोज की मानिंद आसमान में निकला सूरज। रोज की तरह चहकते पंछी चुगने को  चले। रोज की तरह चलती रही इठला के हवा। और तो और बरसने लगी बेमौसम बारिश। कुछ नहीं.. कुछ भी तो पल भर ना थमा... और वो नस्ल कि जिसे पीसना पड़ता है  सदा,खाने के पहले गेहूं का एक दाना भी समझती रही कि... Continue Reading →

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